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Saturday, September 19, 2026
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विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस सुस्त, संगठन की निष्क्रियता से कार्यकर्ता निराश

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लखनऊ|यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर प्रदेश के सभी राजनीतिक दल सक्रिय हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस में इसको लेकर कोई हलचल नहीं है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी लंबे समय से भंग चल रही है और प्रदेश में संगठनात्मक मजबूती को लेकर कोई कार्य नहीं हो रहा है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से भी यूपी चुनाव को लेकर कोई सक्रियता नहीं दिखाई पड़ रही है। इससे आशंका जताई जा रही है कि यूपी चुनाव में कांग्रेस और कमजोर पड़ सकती है। यूपी चुनावों को लेकर कोई सक्रियता न होने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में मायूसी का माहौल है। पार्टी ने पूरे देश की तरह यूपी में भी ‘संविधान बचाओ’ यात्रा के अंतर्गत जनवरी में कुछ कार्यक्रम किए थे। संगठन सृजन अभियान के अंतर्गत भी प्रदेश में संगठन को मजबूत करने का कार्य शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत फरवरी माह में कुछ बैठकें आयोजित की गई थी, लेकिन इसके अलावा संगठन का पूरा कामकाज ठप पड़ा हुआ है। जिला से लेकर ब्लॉक और मंडल स्तर पर पार्टी में कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं चल रही है।

‘मतदाताओं को जोड़ने के लिए कोई प्लान नहीं’

यूपी में कांग्रेस के पास अब मुसलमानों को छोड़कर कोई दूसरा ‘डेडीकेटेड वोटर वर्ग’ नहीं है। पार्टी की किसी सियासी गतिविधि से ऐसा भी नहीं लगता कि वह समाज के किसी दूसरे वर्ग को अपने साथ लाने के लिए किसी खास योजना पर काम कर रही है। कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लेकर दलितों-पिछड़ों में एक भावनात्मक लहर पैदा हुई थी। इसे मजबूती के साथ अपने पाले में लाने की कोशिश की जाती तो कांग्रेस का परंपरागत दलित-पिछड़ा वोट बैंक का एक हिस्सा उसके साथ वापस आ सकता था। ऐसा होने पर पार्टी प्रदेश में खड़ी हो जाती, लेकिन पार्टी ने ऐसी कोई कोशिश नहीं किया। 

‘भारी पड़ेगी सियासी शून्यता’

नेता के अनुसार, ब्राह्मण वर्ग इस समय सत्तारूढ़ दल से नाराज है और अपने लिए विकल्प तलाश रहा है। समाजवादी पार्टी और बसपा इस नाराज वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए तमाम सियासी संदेश दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस अपने इस पुराने परंपरागत वोट बैंक को अपने पास वापस लाने के लिए कोई प्रयास करती नहीं दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि इस तरह की सियासी शून्यता पार्टी को भारी पड़ सकती है।

बिहार में हुआ था नुकसान

कांग्रेस के शीर्ष नेता ने बताया कि पार्टी प्रदेश में अब तक सक्रिय नहीं हुई है। समाजवादी पार्टी से गठबंधन को लेकर भी अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। बिहार में अंतिम समय तक इसी तरह की अनिश्चितता के कारण पार्टी को नुकसान हुआ था। अब उत्तर प्रदेश में भी पार्टी उसी तरह काम करती दिखाई दे रही है। इससे पार्टी को नुकसान हो सकता है।

दूसरे दलों की सक्रियता 

सत्तारूढ़ भाजपा यूपी को लेकर सबसे ज्यादा सक्रिय है। भाजपा-आरएसएस के शीर्ष नेता लगातार इसको लेकर बैठकें कर रहे हैं। पार्टी सरकार के स्तर पर कई उद्घाटन कार्यक्रम कर जनता के बीच सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रही है। 8 मार्च को भी प्रदेश में कई बड़े कार्यक्रम कर जनता को अपने से जोड़ने की तैयारी है। भाजपा-आरएसएस की समन्वय बैठक आयोजित कर बेहतर काम काज करने और कार्यकर्ताओं से सरकार के कामकाज पर जमीनी फीडबैक लेने की कोशिश की जा रही है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी लखनऊ में बड़ी रैली आयोजित कर अपने राजनीतिक विरोधियों को संदेश दे चुकी है। उसके कार्यकर्ता निचले स्तर पर छोटी-छोटी बैठकें कर पार्टी को दुबारा मजबूत करने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं। मायावती लगातार सांगठनिक गतिविधियों को लेकर सक्रिय हैं और विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति को लेकर काम हो रहा है। बसपा में इन प्रभारियों को ही बाद में प्रत्याशी बनाने की परंपरा है। यानी बसपा अभी से प्रत्याशियों के चयन के स्तर पर काम कर रही है।भाजपा को सबसे तगड़ी चुनौती दे रही समाजवादी पार्टी जिला-ब्लॉक स्तर तक संगठन को मजबूत करने का कार्यक्रम चला रही है। 15 मार्च को कांशीराम के जन्मदिन को मनाने के साथ 28 मार्च से अखिलेश यादव नोएडा से शुरू करते हुए पूरे प्रदेश में चुनावी अभियान की शंखनाद करने जा रहे हैं। पार्टी निचले स्तर पर अपना विस्तार करने की कोशिश कर रही है।लेकिन दूसरे दलों की इन चुनावी गतिविधियों के बीच कांग्रेस की अनुपस्थिति लोगों को चौंका रही है। यूपी जैसे राजनीतिक तौर पर सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य में कमजोर पार्टी को मजबूत किए बिना उसकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को जमीन नहीं मिल सकती है। 

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