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Thursday, September 3, 2026
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घर का मंदिर किस दिशा में होना चाहिए? आचार्य रविंद्र कुमार ने बताए वास्तु के महत्वपूर्ण नियम

भारतीय घरों में पूजा स्थान को विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि घर का मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं होता, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति का भी स्रोत होता है। हालांकि आधुनिक फ्लैट संस्कृति और सीमित स्थान के कारण कई लोग मंदिर की दिशा और स्थान पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते। इसी विषय पर प्रसिद्ध ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ आचार्य रविंद्र कुमार ने एक विशेष पॉडकास्ट में घर के मंदिर, मुख्य द्वार और कार्यालय के वास्तु से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए।

पॉडकास्ट के दौरान आचार्य रविंद्र कुमार ने बताया कि वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का मंदिर उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में होना सबसे शुभ माना जाता है। उन्होंने कहा कि ईशान कोण को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है और यही कारण है कि पूजा स्थल के लिए इस दिशा को विशेष महत्व दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि यदि किसी कारणवश ईशान कोण में मंदिर बनाना संभव न हो, तो मंदिर को पूर्व या उत्तर दिशा की दीवार के पास भी स्थापित किया जा सकता है। पूजा करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। उनके अनुसार इससे सकारात्मक वातावरण और मानसिक एकाग्रता बनी रहती है।

आचार्य ने यह भी कहा कि घर के मंदिर को हमेशा साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई लोग मंदिर में एक ही देवता की अनेक मूर्तियां या खंडित मूर्तियां रख देते हैं, जबकि वास्तु की दृष्टि से ऐसा उचित नहीं माना जाता। उनका सुझाव था कि पूजा स्थल में सीमित और व्यवस्थित रूप से देव प्रतिमाएं स्थापित करनी चाहिए तथा नियमित रूप से उनकी साफ-सफाई और पूजा करनी चाहिए।

बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि पति-पत्नी के शयनकक्ष में मंदिर या देवी-देवताओं की बड़ी प्रतिमाएं स्थापित करने से बचना चाहिए। यदि घर में स्थान की कमी हो और परिवार में बुजुर्ग हों, तो उनके कमरे में उचित स्थान पर पूजा स्थल बनाया जा सकता है।

पॉडकास्ट में घर के मुख्य द्वार के महत्व पर भी चर्चा हुई। आचार्य रविंद्र कुमार ने बताया कि वास्तु शास्त्र में पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख्य प्रवेश द्वार को शुभ माना जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी घर की दिशा का अंतिम निर्णय उसकी बनावट, भूखंड और व्यक्ति की जन्म कुंडली सहित कई पहलुओं को देखकर ही किया जाना चाहिए।

इसके अलावा उन्होंने कार्यालय और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के वास्तु पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार ऑफिस में नियमित साफ-सफाई, जाले हटाना, खराब या एक्सपायरी सामान को समय पर निकालना तथा कैश बॉक्स या तिजोरी को उचित दिशा में रखना सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक माना जाता है।

आचार्य ने कर्मचारियों और सहयोगियों के सम्मान पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान की सफलता केवल वास्तु पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वहां कार्य करने वाले लोगों के प्रति सम्मान, अच्छा व्यवहार और सकारात्मक कार्य संस्कृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। स्वच्छ वातावरण, अनुशासन और पारस्परिक सम्मान किसी भी व्यवसाय की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस विशेष पॉडकास्ट में घर के मंदिर की दिशा, मुख्य द्वार, कार्यालय के वास्तु, साफ-सफाई और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़े अनेक विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह जानकारी उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है जो वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों को समझकर अपने घर और कार्यस्थल का वातावरण अधिक व्यवस्थित एवं सकारात्मक बनाना चाहते हैं।

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