12.7 C
London
Thursday, March 5, 2026
HomeLatest NewsNitish Kumar किसके कहने पर भाजपा के करीब आए, Narendra Modi के...

Nitish Kumar किसके कहने पर भाजपा के करीब आए, Narendra Modi के नाम पर पहले हुए थे दूर

#LatestराजनीतिNews #राजनीतिNews #राजनीतिUpdate #राजनीतिNews #BollywoodHindiNews

पटना। नीतीश कुमार की अपनी इच्छा कभी नहीं थी कि वह बिहार छोड़कर जाएं। जैसे लालू प्रसाद यादव नहीं चाहते थे कि वह बिहार से दूर हों, उसी तरह नीतीश कुमार भी हमेशा बिहार में ही सक्रिय रहना चाहते थे। राज्य की ही सेवा करना चाहते थे। अब भी उन्होंने जब राज्यसभा जाने की इच्छा जाहिर की तो वह सेवा भाव दोहराया। बताया जा रहा है कि भाजपा ने एक ‘प्रकरण’ का हवाला देकर दबाव बनाया और यह फैसला उन्होंने आखिरकार ले ही लिया। अब उन्हें भाजपा के साथ रिश्ता कैसा रखना है, यह वक्त बताएगा। फिलहाल भविष्य को समझने के लिए भाजपा के उनके रिश्तों की पूरी कहानी जानिए।

अटल-आडवाणी को अस्पताल में देख हो गए थे साथ

‘अंतरंग दोस्तों की नजर से नीतीश कुमार’- यह किताब नीतीश कुमार के अभिन्न मित्र उदयकांत ने लिखी है। इस किताब की हर लाइन नीतीश कुमार पढ़ चुके हैं, इसलिए इससे ज्यादा किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसमें जिक्र है कि कैसे लालू प्रसाद के साथ नीतीश कुमार बन-संवर कर दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय के कभी चक्कर लगाते थे। यह भी बताया गया है कि लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कितनी जद्दोजहद हुई थी और कैसे चारा घोटाले में नाम आने समेत कई कारणों से उन्होंने दूरी बनाई थी। इसी किताब में एक वाकये का जिक्र है, जब पहली बार नीतीश कुमार भाजपा के करीब आए थे। वह वाकया बताता है कि भाजपा से दूर-दूर रहने वाले नीतीश कुमार किस तरह अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से प्रभावित होकर भाजपा के मंच पर पहुंच गए थे।

समता पार्टी 1994 में कैसे बनी, फिर कब जॉर्ज हुए बीमार

किताब में बताया गया है कि बिहार में लालू राज के दौरान माहौल ऐसा खराब हुआ कि जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में 15 सांसदों ने तत्कालीन जनता दल से किनारा कर लिया। इसमें से 14 अंतिम तौर पर बाहर हो गए- मो. यूनुस सलीम, जॉर्ज फर्नांडीस, नीतीश कुमार, सैयद शहाबुद्दीन, अब्दुल गफूर, मंजय लाल, वृषिण पटेल, हरिकिशोर सिंह, रामनरेश सिंह, महेंद्र बैठा, चरणजीत यादव, मोहन सिंह, हरिकेवल सिंह और रवि राय। इनमें से अंतिम चार को छोड़ सभी बिहार से थे। जनता दल से अलग हुए इस गुट का नाम जनता दल (जॉर्ज) हुआ और फिर समता पार्टी। किताब में लिखा है- “1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपार जनसमर्थन दिखने के बावजूद समता पार्टी के 310 प्रत्याशियों में से सात ही जीत सके। 271 की जमानत जब्त हो गई। पार्टी की आर्थिक-मानसिक हालत बुरी थी। तभी जॉर्ज फर्नांडीस बीमार पड़ गए। नीतीश जब उन्हें देखने मुंबई के अस्पताल पहुंचे तो आश्चर्यजनक रूप से उन्हें वहां लाल कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी दिखे, जो जॉर्ज फर्नांडीस की मिजाजपुर्सी के लिए पहले से थे। जब यह दोनों नेता अस्पताल से निकलने लगे तो जॉर्ज ने नीतीश से कहा कि वह आडवाणी को नीचे तक छोड़ आएं। उतरते समय आडवाणी ने नीतीश को अपनी सभा में शामिल होने का अधिकारपूर्वक न्यौता दिया। ऊपर लौटकर जॉर्ज फर्नांडीस को यह बात बताई तो उन्होंने भी कहा कि अवश्य जाना चाहिए। सभा में अटल-आडवाणी ने बहुत सम्मान से बैठाया। उस मंच से अच्छा संबोधन हुआ और इसके बाद इस मुलाकात के बाद से ही गठबंधन का आधार बन गया। प्रमोद महाजन उसके बाद भाजपा में उनके करीबी हो गए। 1996 में यह गठबंधन जमीन पर उतरा और भाजपा-समता पार्टी ने साथ लोकसभा चुनाव लड़ा। नीतीश भी दूसरी बार सांसद बने और फिर मंत्री भी।” अटल, आडवाणी और प्रमोद महाजन के साथ ही अरुण जेटली से नीतीश कुमार के प्रगाढ़ संबंध रहे हैं। नीतीश ने अटलजी के साथ जेटली की प्रतिमा भी पटना में लगवाई है।

नरेंद्र मोदी से 36 का आंकड़ा क्यों रहा? फिर सुधरा-बिगड़ा भी

नीतीश कुमार लगातार अटल बिहारी वाजपेयी के संरक्षण में चल रही भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे। वह टूटे तब, जब गुजरात दंगों के लिए कथित तौर पर दोषी मानने की सोच के बावजूद वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया। 2014 के लोकसभा निर्वाचन से पहले चुनावी तैयारी शुरू होते ही 2013 में नीतीश कुमार ने इसी विरोध में भाजपा का साथ छोड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू के 40 प्रत्याशी उतारे, लेकिन जब महज दो सीटें हासिल हुईं तो हार की जिम्मेदारी लेते हुए जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। इसके बाद 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव महागठबंधन बनाकर लड़े और कुर्सी पर वापस बैठे। इसी सरकार में शराबबंदी हुई, जिसके बाद से राजद-जदयू में टकराव हुआ। सुशील कुमार मोदी ने लालू परिवार और तेजस्वी से जुड़े घोटालों की नई फाइलें खोलीं तो 2017 में नीतीश महागठबंधन से निकल फिर एनडीए के मुख्यमंत्री बन गए।

यह नरेंद्र मोदी की भाजपा थी। बहुत सहज नहीं रहे, खासकर केंद्र में उलटफेर होने से। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में भागीदारी को लेकर झंझट चला, हालांकि विधानसभा चुनाव में अपनी बात चलने पर नीतीश कायम रह गए। इस चुनाव में कथित रूप से भाजपा के इशारे पर चिराग पासवान ने नीतीश कुमार को भारी नुकसान पहुंचाया। इसका असर 2022 में सामने आया, जब नीतीश जनादेश 2020 को दरकिनार कर महागठबंधन वापस चले गए और सीएम पद की शपथ ली। 2024 के जनवरी में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर भाजपा ने नीतीश की एक पुरानी मांग को जैसे ही माना, रिश्तों में गरमाहट आई और नीतीश फिर एनडीए में आ गए। अब तक वह कायम हैं। राज्यसभा के लिए भेजे जाने के बाद अब आगे क्या रहता है, यह भी देखने वाली बात होगी।

परिवार, शिक्षा और सियासी सफर की कहानी

#LatestराजनीतिNews #राजनीतिNews #राजनीतिUpdate #राजनीतिNews #BollywoodHindiNews बख्तियारपुर|बिहार में गुरुवार को बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया। दरअसल, खबरें आईं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब बिहार की राजनीति...

Arjun Tendulkar ने रचाई शादी, Mumbai में Sania Chandok संग लिए सात फेरे

#LatestsportNews #sportNews #sportUpdate #technlogyNews #sportHindiNews Arjun Tendulkar Wedding: भारत के पूर्व स्टार क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर ने 5 मार्च 2026 को शादी के...