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Friday, September 25, 2026
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ब्रम्हांड से जुडी ताजा खोजने वैज्ञानिकों को किया अचंभित

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नई दिल्ली। खगोल वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड से जुड़ी ताजा एवं हैरान करने वाली खोज ने सोचने पर मजबूर कर दिया है। ब्रम्हांड में पृथ्वी से करीब 731 प्रकाश वर्ष दूर आरएक्सजे0528प्लस2838 नामक एक सफेद बौने तारे के चारों ओर एक चमकता हुआ नेबुला देखा गया है। यह नेबुला देखने में इंद्रधनुष जैसा प्रतीत होता है। यह खोज इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि सफेद बौने तारे को आमतौर पर ‘मृत तारा’ माना जाता है, जिनमें ऊर्जा उत्पादन की कोई सक्रिय प्रक्रिया नहीं होती। इसके बावजूद इस तारे के आसपास पिछले करीब 1000 वर्षों से बना हुआ एक रहस्यमय ‘बो शॉक’ नजर आया है, जिसने अब तक के खगोलीय सिद्धांतों को चुनौती दे दी है। खगोल विज्ञान के अनुसार, जब सूर्य जैसे तारे अपना ईंधन पूरी तरह खत्म कर लेते हैं, तो वे सिकुड़कर सफेद बौने तारे बन जाते हैं। इन तारों में नाभिकीय संलयन बंद हो जाता है, जिससे इन्हें शांत और निष्क्रिय माना जाता है। आरएक्सजे0528प्लस2838 भी आकार में पृथ्वी के बराबर है, लेकिन इसका द्रव्यमान सूर्य जितना है।
आम परिस्थितियों में ऐसे तारे किसी खास चमक या गतिविधि का प्रदर्शन नहीं करते, लेकिन इस तारे के चारों ओर दिखाई दे रहा चमकदार घेरा वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बन गया है। यह चमकता हुआ घेरा गैस और धूल के टकराव से बना ‘बो शॉक’ है, जो आमतौर पर तेज गति से चलने वाले सक्रिय खगोलीय पिंडों के आसपास देखा जाता है। डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तारे के पास न तो कोई ऊर्जा पैदा करने वाली डिस्क है और न ही ऐसा कोई स्पष्ट स्रोत, जो इतनी लंबी अवधि तक इस चमक को बनाए रख सके। इसके बावजूद यह संरचना एक सहस्राब्दी से स्थिर बनी हुई है, जो इसे और भी रहस्यमय बना देती है। वैज्ञानिकों ने इसकी एक संभावित वजह अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को माना है।
अनुमान है कि इस सफेद बौने तारे का चुंबकीय क्षेत्र अपने साथी तारे से निकलने वाले पदार्थ को बिना किसी डिस्क के सीधे अपनी सतह की ओर खींच रहा है। यही प्रवाह अंतरिक्ष में मौजूद गैस और धूल से टकराकर ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है, जिससे यह बो शॉक बन रहा है। हालांकि मौजूदा सिद्धांतों के अनुसार ऐसा प्रवाह अधिकतम 100 वर्षों तक ही टिक सकता है, जबकि यहां यह प्रक्रिया उससे दस गुना अधिक समय से जारी है। पोलैंड के निकोलस कोपरनिकस एस्ट्रोनॉमिकल सेंटर के वैज्ञानिक क्रिस्टियन इल्केविक्ज के मुताबिक, यह किसी अज्ञात खगोलीय तंत्र का संकेत हो सकता है, जिसे अभी समझा जाना बाकी है।

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