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Monday, August 10, 2026
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निकाय चुनाव में कांग्रेस ने उद्धव और शरद गुट को पछाड़ा, MVA में समीकरण बदलने की तैयारी

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नई दिल्‍ली । महाराष्ट्र (Maharashtra) की राजनीति में निकाय चुनाव के नतीजों के बाद एक बार फिर से उठापटक का दौर जारी है। किस नगर निगम में कौन मेयर (Mayor) बनेगा इस पर लेकर पार्टियों के बीच चर्चाओं का दौर जारी है। सबसे महत्वपूर्ण बीएमसी (BMC) के मेयर पद को लेकर भी लगातार राजनीति हो रही है। शिंदे गुट ने अपने पार्षदों को ताज होटल में बैठा कर रखा है, तो उद्धव गुट लगातार भाजपा और शिवसेना के बीच में तनाव पैदा करने के लिए बयानबाजी कर रहा है। हालांकि, इस चुनाव के बाद अब विपक्ष के महाविकास अघाड़ी गठबंधन में भी समीकरण बदलने के आसार लगाए जा रहे हैं। क्योंकि, इन चुनावों में कांग्रेस ने बेहतरी प्रदर्शन करते हुए उद्धव गुट और शरद पवार गुट को भी पीछे छोड़ दिया है। एक तरफ शरद पवार को अपने गढ़ पुणे में करारी हार क्षेलनी पड़ी है, तो वहीं दूसरी तरफ ठाकरे को भी अपने मुंबई की राजशाही को तीन दशक बाद अलविदा कहना पड़ा है। इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी ने कई नगर निगमों में बेहतर प्रदर्शन किया है।

29 नगर निगमों के इस चुनाव में जहां भारतीय जनता पार्टी 1,425 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, तो वहीं एकनाथ शिंदे की शिवसेना 399 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बाद नंबर आता है कांग्रेस का जिसने 324 सीटों के साथ तीसरा स्थान हासिल किया है। महायुति के साथ सत्ता का सुख भोग रहे अजित पवार ने निकाय चुनाव के ऐन पहले अपने चाचा के साथ गठबंधन कर लिया था। हालांकि, इसके बाद भी उन्हें इसका केवल घाटा ही उठाना पड़ा। उनकी पार्टी 167 सीटों के साथ चौथे नंबर पर रही। इसके बाद नंबर उद्धव गुट का रहा, जो केवल 155 सीटें जीतने में कामयाब रहा। शरद पवार को अपनी पार्टी की सबसे बुरी दशा देखनी पड़ी उनकी पार्टी केवल 36 सीटें ही जीत सकी।

 

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस निकाय चुनाव में कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही है। उसने अपने दोनों सहयोगियों उद्धव गुट और शरद गुट से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे में 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले एमवीए में सीट बंटवारे को लेकर पुनर्विचार होना तय है। एक तरफ उद्धव गुट ने अपना गढ़ बीएमसी गंवा दिया है, वहीं दूसरी तरफ शरद पवार ने अपना पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ जैसे गढ़ से हाथ धोया है। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस ने अकेले की दम पर कोल्हापुर, चंद्रपुर और भिंवडी में बेहतर प्रदर्शन किया है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस ने बताया पार्टी अब एमवीए में बड़े हिस्से की मांग करेगी। उनका तर्क है कि ठाकरे और पवार की “क्षेत्रीय अस्मिता” की राजनीति बीजेपी की बढ़त को रोकने में नाकाम रही। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस का अकेले या सीमित गठबंधन में चुनाव लड़ने का फैसला एक तरह का “स्ट्रेस टेस्ट” साबित हुआ, जिससे यह दिखा कि पार्टी मौजूदा दौर में भी टिक सकती है और आगे बढ़ सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शिवसेना उद्धव गुटभले ही मुंबई में बीजेपी की मुख्य चुनौती बनी हुई हो, लेकिन राज्य के अन्य हिस्सों में उसका प्रभाव घटा है। इससे महाविकास अघाड़ी में खुद को संगठनात्मक ताकत के आधार पर वरिष्ठ साझेदार बताने का उसका दावा कमजोर पड़ता है।

निकाय चुनाव के नतीजे यह भी दिखाते हैं कि शिवसेना (यूबीटी) और शिंदे गुट की शिवसेना के बीच वोटों का बंटवारा कई वार्डों में सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए फायदेमंद रहा। विश्लेषकों के अनुसार, ठाकरे की पार्टी के पास भावनात्मक जुड़ाव और ब्रांड पहचान तो है, लेकिन मजबूत और एकजुट संगठन के अभाव में इसे वार्ड स्तर की जीत में बदलना चुनौती बना हुआ है।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा एनसीपी पर टूट का प्रभाव दिखाई दिया। पुणे में पार्टी को दोनों धड़ों के गठबंधन के बाद बी भारी नुकसान उठाना पड़ा और शहरी इलाकों में भी उसे ज्यादा कोई भरोसेमंद जीत नहीं मिली। नतीजों के आधार पर देखें, तो महाराष्ट्र के विपक्ष में इस वक्त कांग्रेस पार्टी ही एक ऐसी पार्टी बची है, जिसकी मौजूदगी पूरे महाराष्ट्र में हैं। इससे कांग्रेस एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी, जिसमें उसका राष्ट्रीय एजेंडा प्राथमिकता में होगा।

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