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Saturday, August 8, 2026
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‘देश हिंदू राष्ट्र ही है’ मोहन भागवत बोले- ‘हिंदुओं को 3 बच्चे पैदा करने से किसने रोका है’

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मुजफ्फरपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रविवार को मुजफ्फरपुर में एक महत्वपूर्ण सामाजिक सद्भाव विचार गोष्ठी सह संवाद को संबोधित किया. उन्होंने समाज में एकता और सद्भाव पर जोर देते हुए कहा कि जब हर जाति और बिरादरी उन्नत होगी, तभी समाज और देश वास्तविक प्रगति कर पाएगा.

जनसंख्या नियंत्रण और हिंदू राष्ट्र पर विचार: जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को तीन बच्चे पैदा करने से किसी ने नहीं रोका है, जबकि सरकार 2-1 बच्चों की नीति की बात करती है. हिंदू राष्ट्र के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही हिंदू राष्ट्र है. भारत में विविधता है, अलगाव नहीं. अंग्रेजों ने अलगाव बढ़ाकर शासन किया, अब उस अलगाव को समाप्त कर समाज को एकजुट करना है.

 

“हिंदू समाज को तीन बच्चे पैदा करने से किसी ने नहीं रोका है. सरकार भी 2-1 बच्चों की बात करती है. देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह हिंदू राष्ट्र है ही. भारत में विविधता है, अलगाव नहीं.”मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

विदेशी शक्तियों की चिंता और भारत की प्रगति: डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि आज भारत के आगे बढ़ने की अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं. कुछ विदेशी शक्तियां भारत की प्रगति नहीं चाहतीं, क्योंकि उन्हें अपनी ‘दुकान’ बंद होने का डर है. इसी कारण वे भारत के विकास के मार्ग में बाधाएं खड़ी करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि डर और कमजोरी को दूर करने के लिए आत्मनिर्भरता आवश्यक है, जो समस्याओं का स्थायी समाधान प्रदान कर सकती है.

सद्भाव की आवश्यकता और ऐतिहासिक सबक: सरसंघचालक ने विश्व स्तर पर सद्भाव की कमी पर चिंता जताई और कहा कि यदि सद्भाव नहीं रहा तो लोग आपस में लड़कर नष्ट हो जाएंगे. उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए बताया कि कोई विदेशी शक्ति ने अपनी ताकत से भारत को पराधीन नहीं बनाया, बल्कि हमारी आपसी फूट का फायदा उठाकर शासन किया. यदि समाज में सद्भाव बना रहेगा तो लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार बनेंगे और समस्याएं स्वतः हल होती जाएंगी.

समाज की जागृति और स्थानीय स्तर पर समाधान: डॉ. भागवत ने कहा कि समाज अब जाग रहा है और देश तेजी से आगे बढ़ रहा है. यदि खंड या प्रखंड स्तर पर समाज अपनी समस्याओं पर बैठकर विचार-विमर्श करे तो लोगों को किसी नेता पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उन्होंने विभिन्न जातियों और बिरदरियों के उत्थान के साथ अन्य समाजों की समस्याओं के समाधान के प्रयासों की जानकारी भी ली. कार्यक्रम में क्षेत्र कार्यवाह मोहन सिंह ने विषय प्रवेश कराया, जबकि क्षेत्र संघचालक देवव्रत पाहन, उत्तर बिहार प्रांत संघचालक गौरीशंकर प्रसाद सहित कई वरिष्ठ स्वयंसेवक उपस्थित रहे.

प्रश्नोत्तर सत्र में सज्जन शक्ति पर जोर: दूसरे सत्र में प्रश्नोत्तर के दौरान सरसंघचालक ने कहा कि केवल समस्या बताने के बजाय उसका समाधान भी सुझाना चाहिए. आज देश सज्जन शक्ति के भरोसे आगे बढ़ रहा है, जहां लोग अपने स्तर पर समाज की समस्याएं दूर कर रहे हैं. लेकिन इस प्रयास को और नीचे तक ले जाना जरूरी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल व्यवस्था से समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बल्कि समाज के लोग आपस में चिंतन करेंगे तभी स्थायी हल निकलेगा.

जाति संगठनों की भूमिका और सेवा भाव: डॉ. भागवत ने कहा कि प्रखंड स्तर पर समाज और जाति के संगठनों को भौतिक तथा नैतिक उत्थान पर गंभीरता से विचार करना होगा. उन्होंने जोर दिया कि केवल संपन्न लोग ही समाज सेवा कर सकते हैं, ऐसा नहीं है. जिसके मन में सद्भाव होगा, वही पीड़ितों और जरूरतमंदों की सेवा कर सकता है. कई गांवों के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि समाज ने बिना सरकारी मदद के भी अपनी समस्याओं का समाधान किया है.

विभिन्न संगठनों के सामाजिक कार्य: गोष्ठी में विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने कार्यों की जानकारी दी. तैलिक साहू समाज ने कोरोना काल में मुजफ्फरपुर के छोटी कल्याणी क्षेत्र में कोरोना वॉरियर्स की सेवा का उल्लेख किया. एक संगठन ने समाज की लड़कियों के सामूहिक विवाह कराने की बात बताई, जबकि सहरसा में रोटी बैंक चलाने वाले संगठन ने दिव्यांग और जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराने तथा सेवा के विस्तार की जानकारी साझा की. यह कार्यक्रम संघ के शताब्दी वर्ष में सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ.

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