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Wednesday, September 23, 2026
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45 दिनों का कच्चा तेल स्टॉक तैयार

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नई दिल्ली: ईरान संकट के बीच होर्मुज स्ट्रेड के रास्ते कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है. ट्रंप की ओर से साफ कर दिया गया है कि ये वॉर करीब 1 महीने तक चल सकती है. इसका मतलब है कि कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई चेन में काफी बड़ी बाधा आ सकती है. जिसकी वजह से ग्लोबल इकोनॉमी की टेंशन में इजाफा देखने को मिल सकता है. लेकिन भारत को ऐसी टेंशन बिल्कुल भी नहीं है. भारत के पास कच्चे तेल का इतना स्टॉक है कि 45 दिनों तक उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता. इसका मतलब है कि कच्चे तेल की बाधित सप्लाई देश की रफ्तार को नहीं रोक सकती है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर कच्चे तेल को लेकर किस तरह के आंकड़े सामने आई है.

ऊर्जा बाजार विश्लेषण फर्म केप्लर के आकलन के अनुसार ईरान संकट के बीच होर्मुज स्ट्रेड के रास्ते कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के पास लगभग 40-45 दिन की जरूरत पूरी करने लायक कच्चे तेल का भंडार मौजूद है. केप्लर के मुताबिक, भारत के पास करीब 10 करोड़ बैरल कमर्शियल कच्चे तेल का स्टॉक है. इसमें रिफाइनरीज के पास मौजूद स्टॉक, भूमिगत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और देश की ओर आ रहे जहाजों पर लदा तेल शामिल है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है. कुल आयात का आधे से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और इसका बड़ा भाग होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. भारत प्रतिदिन औसतन करीब 50 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 25 लाख बैरल तेल प्रतिदिन होर्मुज रूट से आता है.

केप्लर के प्रमुख रिसर्च ऐनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यदि पश्चिम एशिया से तेल सप्लाई अस्थायी रूप से रुकती है, तो तत्काल असर सप्लाई व्यवस्था और कीमतों पर पड़ेगा. हालांकि, रिफाइनरीज सामान्यतः वाणिज्यिक भंडार बनाए रखती हैं और पहले से रवाना हो चुके तेलवाहक जहाजों के आते रहने से अल्पकालिक राहत मिलेगी. हालांकि, रितोलिया ने कहा कि लंबे समय तक व्यवधान बने रहने पर तेल आयात की लागत, ढुलाई खर्च और वैकल्पिक मार्गों के कारण दबाव बढ़ेगा. वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड का दाम 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जो ईरान संकट शुरू होने के पहले के स्तर से करीब 10 प्रतिशत अधिक है. भारत ने पिछले वित्त वर्ष में कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे. चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जनवरी अवधि में भी 20.63 करोड़ टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं.

मीडिया खबरों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में संघर्ष छिड़ने के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही प्रभावित हुई है. यह 33 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल निर्यात का लगभग एक-तिहाई तथा गैस आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है. विश्लेषकों का कहना है कि भारत पश्चिम अफ्रीका, लातिनी अमेरिका, अमेरिका और रूस से अतिरिक्त आपूर्ति लेकर इस कमी की भरपाई कर सकता है. इसके अलावा जरूरत पड़ने पर रूसी तेल की ओर भी रुख किया जा सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, तात्कालिक जोखिम भौतिक कमी से अधिक कीमतों में उतार-चढ़ाव और आयात बिल बढ़ने का है. हालांकि, व्यवधान लंबा और गंभीर होने की स्थिति में तेल आयात बिल में उल्लेखनीय वृद्धि और व्यापक आर्थिक दबाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.

 

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News Desk

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