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Friday, February 27, 2026
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 फिर से सत्ता में लौटने के लिए ममता ने साध लिए युवा और महिला वोटर……दो योजनाएं बनेगी चुनाव में गेंमचेंजर 

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कोलकत्ता । पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर जारी है। राज्य में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ ममता बनर्जी की ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच दिख रहा है। 294 सदस्यीय विधानसभा में टीएमसी की मजबूत पकड़ है, जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। अन्य वाम दलों और नवगठित पार्टियों का गठबंधन चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है, लेकिन असली टक्कर युवाओं और महिलाओं के वोट पर केंद्रित है।
इस लेकर ममता बनर्जी ने इस बार दो प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से राजनीतिक मोर्चा मजबूत किया है। पहली, पहले से चल रही ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना, जो 2.42 करोड़ महिलाओं को आर्थिक सहायता देना है। इस योजना में मासिक सहायता 1,500 रुपये कर दी गई है, और 2021 में महिलाओं के समर्थन ने टीएमसी को निर्णायक बढ़त दिलाई थी। दूसरी, नई ‘युवा साथी’ योजना, जिसमें 21-40 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को मासिक 1,500 रुपये दिए जाएंगे। न्यूनतम योग्यता 10वीं पास है और आवेदन प्रक्रिया शुरू होने के नौ दिनों में करीब 78 लाख युवाओं ने आवेदन किया। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस आयु वर्ग के मतदाता कुल वोटरों का करीब 45 प्रतिशत हो सकते हैं, जिससे योजना चुनावी समीकरण बदल सकती है।
वहीं राज्य में सियासी मुद्दों में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) भी अहम है। भाजपा एसआईआर को अपनी रणनीति के तहत लाभकारी मानती है, जबकि ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के द्वारा की जा रही एसआईआर प्रक्रिया को राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने मृत 61 लोगों के परिवारों से एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा कर मानवीय संदेश भी दिया। 2021 में टीएमसी को 49 प्रतिशत वोट शेयर और 213 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत से अधिक वोट और 77 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा घुसपैठ और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। वहीं, ममता की योजनाएं सीधे लाभ पर केंद्रित होने के कारण महिला और युवा वोटरों को आकर्षित करने की संभावना रखती हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का आगामी चुनाव आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं और वैचारिक मुद्दों के बीच बेहद रोचक और कड़ा मुकाबला साबित होने वाला है। ममता की दोहरी रणनीति—युवाओं और महिलाओं पर फोकस—भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है और चुनावी समीकरण को नया आकार दे सकती है।

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