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Thursday, October 29, 2026
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‘क्या यूपी भाजपा में सब ठीक है ?’ सरसंघचालक मोहन भागवत ने सीएम योगी समेत दोनों उप मुख्यमंत्रियों से क्यों की मुलाकात, जानें

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नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश में सब ठीक है या घमासान मचा हुआ है ? सरकार और केंद्र के बीच क्या चल रहा है ? उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सनातन धर्म और हिंदुत्व के मुद्दे पर हलचल तेज हो गई है.

सनातन धर्म, शंकराचार्य विवाद और यूजीसी नियमों को लेकर आंतरिक असंतोष और डिप्टी सीएम के अलग-अलग रुख ने सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह सिर्फ स्थानीय मुद्दे हैं या केंद्र सरकार के साथ कोई गहरा तनाव है ? केंद्र अभी तक चुप है, जिससे कुछ लोग इसे “पर्दे के पीछे की रणनीति” भी मान रहे हैं. हाल की घटनाओं पर नजर डालें, तो एक के बाद एक उत्तर प्रदेश की सियासत में होते घटनाक्रम और केंद्र की चुप्पी ने बहुत से सवालों को जन्म दे दिया है.

उत्तर प्रदेश में माघ मेले में बटुक ब्राह्मणों के साथ पुलिस की कथित बदसलूकी के बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने पहले इसका विरोध किया था और अब वह समर्थन करते नजर आ रहे हैं. दूसरे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी 101 बटुकों का सम्मान किया है. ब्रजेश पाठक ने अपने लखनऊ आवास पर बटुकों को तिलक लगाया, फूल बरसाए और उनका आशीर्वाद लिया. उन्होंने इस घटना को “महापाप” करार दिया और कहा कि परंपराओं का सम्मान करना समाज की जिम्मेदारी है.

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को “कालनेमि” (रामायण का राक्षस) कहकर विवाद खड़ा कर दिया था.

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया था और उनसे मुलाकात की थी, तब सीएम योगी ने इसे “मर्यादा” का मुद्दा बताया था. हालांकि, शंकराचार्य ने डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के सम्मान पर तंज कसते हुए कहा था, “पहले मारते हो, फिर फूल चढ़ाते हो. क्या इससे शांति हो जाएगी?” उन्होंने आरोप लगाया कि गेरुआ वस्त्र पहनने के बावजूद शासन में सनातन प्रतीकों का अपमान हो रहा है.

इसी बीच, सीएम योगी आदित्यनाथ ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से लखनऊ में मुलाकात की. यह तीन महीनों में दूसरी बैठक है, जो आरएसएस के शताब्दी वर्ष के प्रचार कार्यक्रम के तहत हुई.

सूत्रों के मुताबिक, बैठक में 2027 के विधानसभा चुनावों की रणनीति पर चर्चा हुई. इसमें हिंदुत्व लहर को मजबूत करने, समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति का मुकाबला करने और बूथ स्तर पर समन्वय पर जोर दिया गया.

संघ प्रमुख ने सीएम के साथ बैठक के बाद एक-एक करके दोनों डिप्टी सीएम से भी गुरुवार को मुलाकात की. इस मुलाकात को हिंदुत्व एजेंडे को मजबूत करने का संकेत भी बताया गया है. लेकिन यूजीसी नियमों जिनसे सवर्ण समाज नाराज है, इस पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं आया.

देखा जाए, तो यूपी में विकास पर सबकी नजरें टिकी हैं. केंद्र सरकार इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है. पार्टी के कुछ नेताओं का जो कैमरे पर कुछ भी कहने से बच रहे हैं, दबी जुबान में यह भी कह रहे कि यह सनातन धर्म के नाम पर योगी के खिलाफ पर्दे के पीछे चल रही रणनीति हो सकती है. ये नेता भाजपा में आंतरिक कलह की बातें भी कह रहे हैं.

जहां डिप्टी सीएम मौर्या और पाठक जैसे नेता खुद को मजबूत करने की कोशिश में लगे हैं, वहीं यूजीसी की नई इक्विटी रेगुलेशंस ने हिंदू एकता की कोशिशों को झटका दिया है. इससे जातिगत असंतोष बढ़ा है. क्या यह मुख्यमंत्री को ‘एक्सपोज’ करने की साजिश है ?

विपक्षी नेता, जैसे अखिलेश यादव ने इसे ‘राजनीतिक स्टंट’ बताया, जबकि भाजपा विधायक नंदकिशोर गुज्जर ने पाठक को सनातन का झंडाबरदार करार दिया. 2027 चुनाव नजदीक है, और यूपी भाजपा में यह घटनाक्रम हिंदुत्व, जाति और विकास के बीच संतुलन की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है. मगर सवाल ये है कि क्या केंद्र की चुप्पी एक सोची-समझी रणनीति है, या सिर्फ संयोग? ये बातें आने वाले दिन ही तय होंगे.
 

 

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