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Monday, November 2, 2026
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क्या फिर साथ आएंगे ‘बुआ-बबुआ’?

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लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर संभावित सामाजिक समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। अखिलेश यादव ने हालिया सार्वजनिक कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच रिश्तों के “गहरे होने” के संकेत देकर सियासी हलचल बढ़ा दी है। बसपा से जुड़े रहे वरिष्ठ नेता के सपा में शामिल होने और मायावती पर नरम रुख अपनाने को राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूला अब केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक समीकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह प्रयास बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक में विश्वास पैदा करने और साझा सामाजिक एजेंडा गढ़ने की कोशिश है। सपा नेतृत्व अब समावेशी छवि के साथ खुद को व्यापक सामाजिक गठबंधन के केंद्र में स्थापित करना चाहता है।

सपा-बसपा संबंधों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के गठबंधन ने सत्ता समीकरण बदल दिए थे, लेकिन 1995 की घटनाओं ने दोनों दलों के बीच गहरी दूरी पैदा कर दी। 2019 में पुनः साथ आने के बावजूद गठबंधन टिक नहीं सका। इसलिए मौजूदा संकेतों को लेकर राजनीतिक वर्ग में उत्सुकता के साथ सावधानी भी दिखाई दे रही है।

हाल के चुनावी अनुभवों ने सपा नेतृत्व को दलित प्रतिनिधित्व के महत्व का एहसास कराया है। पार्टी अब वैचारिक समन्वय, प्रतीकात्मक सम्मान और संगठनात्मक साझेदारी के माध्यम से भरोसा मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो राज्य की सामाजिक संरचना आधारित राजनीति का नया मॉडल सामने आ सकता है। इसी बीच योगी आदित्यनाथ सरकार पर विपक्ष के हमले भी तेज हुए हैं। परंपरा, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाज़ी ने माहौल को और गर्म कर दिया है।

फिलहाल औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बदले हुए सुर, नए सामाजिक समीकरण और साझा राजनीतिक संदेश इस संभावना को जीवित रखते हैं कि 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। यदि संवाद आगे बढ़ता है, तो राज्य की चुनावी बिसात पर समीकरण निर्णायक रूप से बदल सकते हैं।

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News Desk

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