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Saturday, August 22, 2026
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पाकिस्तान की पुरानी कहानी; एशिया कप से चला आ रहा ड्रामा

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टी20 विश्वकप 2026 का हाईवोल्टेज ड्रामा अब समाप्त हो चुका है। पाकिस्तान ने आखिरकार एलान किया कि वह भारत के खिलाफ 15 फरवरी को होने वाले मैच में खेलने को तैयार है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष ने इतने दावों और गीदड़भभकियों के बाद ऐसा करके अपने देश का और खुद का फिर से मजाक बनवा लिया है। जब एक फरवरी को पाकिस्तान ने बड़े जोश के साथ भारत के खिलाफ मैच नहीं खेलने की धमकी दी थी, तभी ज्यादातर लोगों ने कह दिया था, इन्हें आखिर में खेलना ही पड़ेगा। महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर उन पहले लोगों में थे जिन्होंने खुलकर कहा कि यह फैसला ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था, ‘इसमें नया क्या है? हम जानते हैं पाकिस्तान के खिलाड़ी रिटायर होते हैं और चार दिन बाद वापस आ जाते हैं। यहां भी ऐसा ही हो सकता है।’ एक हफ्ते बाद वही हुआ।

संसद में एलान, फिर वापसी

आप खुद ही सोचिए, एक देश का प्रधानमंत्री संसद में खड़े होकर बहिष्कार का एलान करे और कुछ दिन बाद उसी फैसले से पीछे हटना पड़े। उस देश की कितनी किरकिरी होगी। पाकिस्तान के साथ यही हुआ।सोमवार को पाकिस्तानी सरकार का एक और बयान आया, जिसमें अपने ही फैसले को पलटते हुए कहा गया, ‘यह फैसला क्रिकेट की भावना को बचाने के लिए लिया गया है।’ बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है, बस दिक्कत यह है कि भावना तब याद आई जब विकल्प लगभग खत्म हो चुके थे।
 
यह पहली बार नहीं, एशिया कप में पलटे थे

मोहसिन नकवी के दौर में ऐसा पलटना नया नहीं है। पिछले साल एशिया कप में भी यूएई के खिलाफ मैच से पहले बहिष्कार की धमकी दी गई थी। कहा गया था कि मैच रेफरी ने गलत किया। टॉस से पहले कहानी बदली, बताया गया कि माफी मिल गई। रेफरी वहीं रहे, मैच हुआ, मामला खत्म। इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि सामने भारत था, क्रिकेट की सबसे बड़ी कमाई वाला मुकाबला।

असली टक्कर सिद्धांत बनाम गणित

भारत-पाकिस्तान मैच को ब्रॉडकास्ट की दुनिया में सोने की खान माना जाता है। माना जाता है कि यह मुकाबला 200 मिलियन डॉलर से ज्यादा की वैल्यू रखता है। अब सोचिए, जिस बोर्ड की सालाना कमाई लगभग 35-40 मिलियन डॉलर हो, वह ऐसा मैच छोड़ दे, संभव था क्या? कागज पर यह क्रांति लगती थी, असल में यह आत्मघाती कदम होता। हंसने वाली बात है न…

बांग्लादेश के नाम पर राजनीति

जब बांग्लादेश ने अपने मैचों को लेकर आपत्ति जताई, तब पाकिस्तान ने इसे सिद्धांत का मुद्दा बताया। कहा गया कि क्षेत्रीय एकजुटता दिखानी है। सुनने में अच्छा था, लेकिन टूर्नामेंट के पहिये भावनाओं से नहीं, लॉजिस्टिक्स और पैसों से चलते हैं। जैसे ही आईसीसी ने साफ किया कि नियम अपनी जगह हैं, पूरा मामला बदलने लगा।

बंद कमरों में क्या हुआ

फोन लगातार बज रहे थे। ब्रॉडकास्टर्स, स्पॉन्सर, बोर्ड, सबको जवाब चाहिए था। आईसीसी ने बातचीत के लिए लोगों को लगाया। बांग्लादेश बोर्ड को भी शामिल किया गया। पाकिस्तान की तरफ से ऐसी मांगें सामने आईं जिन्हें मानना लगभग नामुमकिन था, जैसे भारत के साथ द्विपक्षीय क्रिकेट फिर शुरू कराया जाए या नई सीरीज बना दी जाए। आईसीसी ने विनम्रता से सुना, फिर मना कर दिया।

फिर रास्ता कैसे निकला?

आईसीसी ने इतना जरूर कहा कि बांग्लादेश पर कोई सजा नहीं होगी और उसका राजस्व सुरक्षित रहेगा। पाकिस्तान के लिए यही जीत बताने का आधार बन गया। जनता को दिखाने के लिए एक नतीजा मिल गया, भले ही मूल धमकी हवा हो चुकी थी। हंसने की बात है न…

सच्चाई क्या थी?

असली सच्चाई यही है कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मैच की जरूरत किसी और बोर्ड या काउंसिल से ज्यादा है। पैसे, राजनीति, दर्शक, सब कुछ इससे जुड़ा था। अगर टीम नहीं उतरती तो ब्रॉडकास्टर्स छूट मांगते, स्पॉन्सर नाराज होते और फैंस सबसे पहले सवाल पूछते। इसलिए वापसी तय थी। बस समय का इंतजार था और आखिरकार…ठीक वैसा ही हुआ जैसा पहले दिन से कहा जा रहा था। पाकिस्तान खेलेगा। बयान अब यह है कि बातचीत हुई, न्याय मिला, सिद्धांत बचा लिया गया। तकनीकी रूप से यह सब सही लग सकता है, लेकिन दुनिया ने देखा कि असली धमकी कब खत्म हुई, जब हिसाब लगाया गया।

छवि पर असर

इस पूरे प्रकरण ने एक बात फिर सामने रख दी, ऊंची आवाज में सिद्धांत की बात करना आसान है, लेकिन जब गणित सामने आता है तो फैसले बदलते देर नहीं लगती। आईसीसी ने राहत की सांस ली, बांग्लादेश जुर्माने से बच गया, पर टूर्नामेंट से बाहर हो गया, और पाकिस्तान वहीं पहुंचा जहां उसे होना ही था…मैदान पर।

अब आगे क्या?

15 फरवरी को जब टीमें उतरेंगी तो स्टेडियम भरा होगा, टीवी रेटिंग आसमान छुएगी। लोग चौके-छक्के याद रखेंगे, यह हफ्ते भर का ड्रामा नहीं। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी दर्ज हो चुकी है। वो कहावत है न, ‘कोयला होय न ऊजलौ, सौ मन साबुन लाय।’ यानी फितरत बदलना आसान नहीं होता। इसलिए अगर भविष्य में फिर कभी पाकिस्तान की ऐसी कोई नई धमकी, नया बहिष्कार या नया अल्टीमेटम सुनाई दे, तो दुनिया शायद उतनी हैरान नहीं होगी।लोग पहले ही मानकर चलेंगे कि यह स्क्रिप्ट का हिस्सा है, अंत में पाकिस्तान का यू-टर्न तय है। सबसे बड़ा नुकसान यही है। जब बार-बार पलटना आदत बन जाए, तो शब्दों की साख खत्म हो जाती है। अगली बार चाहे पाकिस्तान का बयान कितना भी ऊंचा क्यों न हो, प्रतिक्रिया यही होगी, रुको, कुछ दिन में फैसला बदल जाएगा।

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