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Wednesday, August 12, 2026
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द श्राइन इटर्नल’- जहाँ इतिहास, पुरातत्त्व और श्रद्धा एक साथ बोलते हैं

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पीएम मोदी के लेख में उल्लेखित पुस्तक के बहाने सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनर्निर्माण की सम्पूर्ण कथा

अहमदाबाद| आततायी महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर किए गए आक्रमण को 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस विदेशी आक्रमणकारी द्वारा हुआ आक्रमण भारत की अस्मिता पर कुठाराघात समान था। इस एक हजार वर्ष के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखे गए विशेष लेख में एक विशेष पुस्तक का उल्लेख किया गया था। इस पुस्तक के बारे में जानने के लिए जिज्ञासु गूगल सर्च इंजन चला रहे हैं।
यह पुस्तक यानी कनैयालाल माणेकलाल मुनशी द्वारा 1951 में लिखी गई ‘सोमनाथ : द श्राइन इटर्नल’ ! इस पुस्तक में भगवान श्री सोमनाथ के मंदिर के बारे में ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व का परिचय दिया गया है। प्रधानमंत्री द्वारा हुए उल्लेख के कारण हाल में यह पुस्तक चर्चा एवं पठन के केन्द्र में है। ऐसे में यह इस पुस्तक के बारे में और जानना रुचिप्रद होगा।
गुजरातियों के लिए गुजरात की अस्मिता के ज्योतिर्धर क. मा. मुनशी परिचय के मोहताज नहीं है। वे राजनीतिक पुरुष के अलावा एक अच्छे लेखक थे। उनकी पुस्तकों के केन्द्र में इतिहास एवं सांस्कृतिक आदि विषय रहे हैं। गुजरातियों को अंग्रेजी में लिखी पुस्तकें पढ़ने में बहुत खास आदत नहीं है। अंग्रेजी में भी गुजरात तथा गुजरात के इतिहास के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, जिसमें कनैयालाल मुनशी को भी सिरमौर माना जा सकता है।
उनके द्वारा लिखित ‘पाटणनी प्रभुता’, ‘जय सोमनाथ’, ‘गुजरातनो नाथ’, ‘भग्न पादुका’, ‘कृष्णावतार भाग 1 से 7’ जैसी पुस्तकें पढ़ने से गुजरात के इतिहास के अलावा धार्मिक विभूतियों की दिलचस्प जानकारी स्थल-काल के साथ जानने को मिलती है।
सोमनाथ – द श्राइन इटर्नल पुस्तक में कनैयालाल मुनशी ने भगवान श्री सोमनाथ मंदिर का ऐतिहासिक एवं पुरातात्तिवक परिचय दिया है। उन्होंने सोमनाथ मंदिर को भारत की अस्मिता का प्रतीक बताया है। क्यों यह मंदिर भारत की सांस्कृतिक धरोहर के लिए महत्वपूर्ण है ? इसका अहसास इस पुस्तक को पढ़ने से आ सकता है। हाल में सोमनाथ में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है, तब इस पुस्तक के बारे में भी जानना महत्वपूर्ण है।
यह पुस्तक भारतीय विद्या भवन की ‘बुक्स यूनिवर्सिटी’ श्रृंखला अंतर्गत प्रकाशित की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति के मूलभूत मूल्यों का आधुनिक ज्ञान के साथ संयोजन करना है।
मुनशीजी ने इस पुस्तक का प्रथम संस्करण मई-1951 में सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना तथा ज्योतिर्लिंग प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर लिखा था। लेखक स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने शैक्षणिक विद्वता के दावे के बिना, बल्कि एक अत्यंत श्रद्धालु तथा इतिहास के जिज्ञासु के रूप में यह पुस्तक बहुत ही कम समय में तैयार की थी, जिससे सोमनाथ के इतिहास को लोगों के समक्ष रखा जा सके।
इस पुस्तक का उद्देश्य उच्च शिक्षा एवं संस्कार देना है। इस पुस्तक द्वारा मानव गरिमा एवं नैतिक व्यवस्था (मोरल ऑर्डर) की स्थापना करने का प्रयास किया गया है, जिससे मनुष्य भगवान का सच्चा अंश बन सके।
पुस्तक मुख्यतः चार भागों में बँटी हुई है। पहले भाग में सोमनाथ की पौराणिक कथाएँ तथा इतिहास है, दूसरे भाग में रोमांस इन स्टोन यानी पत्थरों में उत्कीर्णित स्थापत्य है, तीसरे भाग में पुरातात्तिवक उत्खनन (एक्सकैवेशन्स) द्वारा मिले प्रमाण हैं और चौथे भाग में मुस्लिम इतिहासकारों के उल्लेखों तथा विभिन्न शिलालेखों का विवरण दिया गया है।
लेखक ने सोमनाथ को ‘चंद्रना देव’ (लॉर्ड ऑफ सोम) के रूप में वर्णित किया है और प्रभास क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा की है। मंदिर राख से पुनः खड़े होने वाले फिनिक्स पक्षी की तरह राख से पुनः उठ खड़ा होकर अनेक विनाश के बाद भी अजेय रहा है। पुस्तक में भगवान श्री कृष्ण के देहोत्सर्ग के पवित्र स्थान का भी उल्लेख है।
इस पुस्तक में सोमनाथ पर हुए आक्रमणों का विस्तृत इतिहास है। 1025 में महमूद गजनवी द्वारा किए गए विनाश से लेकर अलाउद्दीन खिलजी तथा औरंगजेब के काल तक के कठिन काल का वर्णन यहाँ देखने को मिलता है। मुनशीजी ने इस विनाश को केवल इमारत का विध्वंस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा पर हुए आघात के रूप में प्रस्तुत किया है।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोमनाथ के आधुनिक पुनरुत्था पर केन्द्रित है। 13 नवंबर, 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने जर्जर मंदिर के प्रांगण में समुद्री जल के साथ जो संकल्प किया था, उसे क. मा. मुनशी ने भारत के गौरव की पुनर्स्थापना के रूप में आलेखित किया है।
पुस्तक में बी. के. थापर द्वारा किए गए वैज्ञानिक उत्खनन की रिपोर्ट भी शामिल है। इस विभाग में पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त प्राचीन मंदिर के स्तरों, शिलालेखों और मूर्तियों के आधार पर मंदिर के प्राचीन स्थापत्य की कड़ियों को जोड़ा गया है, जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
पुस्तक के नए संस्करणों में नए मंदिर के निर्माण की प्रगति के बारे में बताया गया है। नए मंदिर को ‘कैलास महामेरु प्रसाद’ के रूप में परिचित कराया गया है, जिसकी ऊँचाई 155 फीट है। पुस्तक में अनेक रेखाचित्र तथा फोटोग्राफ हैं, जो सोमनाथ की कलात्मक भव्यता के दर्शन कराते हैं।
‘सोमनाथ : द श्राइन इटर्नल’ केवल इतिहास की पुस्तक नहीं है, बल्कि भारतीय प्रजा की अखंडा श्रद्धा की प्रती है। मुनशीजी के मतानुसार सोमनाथ अनंत ज्योति है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारत को उसकी सांस्कृतिक जड़ों के साथ जोड़कर रखती है तथा स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा देती है। 
जिस प्रकार गंगा नदी पहाड़ों से निकलकर अनेक मोड़ लेने के बावजूद समुद्र तक पहुँच कर अपनी पवित्रता बनाए रखती है, उसी प्रकार सोमनाथ का इतिहास भी संघर्षों के बावजूद अपनी गरिमा बनाए रखते हुए अनंत रहा है, जिसका सटीक चित्रण इस पुस्तक में देखने को मिलता है।

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News Desk

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