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Friday, November 6, 2026
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क्या होती है महिला जननांग विकृति? CJI बीआर गवई ने भी जताई चिंता, बोले- आज भी जारी


नई दिल्‍ली । भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई (BR Gawai )ने शनिवार को कहा कि संविधान(Constitution) की गारंटी होने के बावजूद देश में आज भी अनेक बच्चियां अपने मौलिक अधिकारों(fundamental rights) और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं(Basic Requirements) से वंचित हैं और महिला जननांग विकृति जैसी हानिकारक प्रथाओं का सामना कर रही हैं। गवई ने यह टिप्पणी ‘बालिका सुरक्षा: एक सुरक्षित और सक्षम भारत की ओर’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परामर्श के दौरान की। इसे न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली किशोर न्याय समिति ने आयोजित किया।

गौरतलब है कि FGM की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) इस समय सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है। यही पीठ सबरीमाला मंदिर, पारसी अगियारी और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े भेदभावपूर्ण धार्मिक प्रथाओं पर भी सुनवाई कर रही है।

कार्यक्रम में बोलते हुए CJI गवई ने कहा, “यह असुरक्षा बच्चियों को यौन शोषण, तस्करी, बाल विवाह, कुपोषण, लिंग आधारित गर्भपात और एफजीएम जैसी हानिकारक प्रथाओं के उच्च जोखिम में डालती है।” उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति ने जहां लड़कियों को सशक्त बनाया है, वहीं नई तरह की कमजोरियां भी पैदा की हैं।

सीजेआई ने कहा, “आज खतरें सिर्फ भौतिक नहीं हैं। वे डिजिटल दुनिया में भी हैं। ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर बुलिंग, डिजिटल स्टॉकिंग, व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और डीपफेक इमेजरी जैसी चुनौतियां नित नई जटिलता ले रही हैं।”

एफजीएम क्या है?

यूनिसेफ के मुताबिक, महिला जननांग विकृति (FGM) उन सभी प्रक्रियाओं को संदर्भित करती है जिनमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिला के बाह्य जननांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से हटाया जाता है या महिला जननांगों को अन्य प्रकार की क्षति पहुँचाई जाती है। यह प्रायः शैशवावस्था से 15 वर्ष की आयु के बीच की छोटी लड़कियों पर किया जाता है। FGM चाहे जिस भी रूप में किया जाए, यह लड़कियों और महिलाओं के मौलिक मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जिसमें उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान के अधिकार भी शामिल हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने नीति निर्माताओं और प्रवर्तन एजेंसियों से आग्रह किया कि वे वर्तमान युग की इन नई चुनौतियों को समझें और तकनीक को मुक्ति का साधन बनाएं, न कि शोषण का उपकरण। उन्होंने कहा, “आज बालिका की सुरक्षा का अर्थ है कि उसे कक्षा में, कार्यस्थल पर और हर स्क्रीन पर सुरक्षित भविष्य प्रदान करना।”

वहीं, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत में एक लड़की को सच्चे अर्थों में समान नागरिक तब माना जा सकता है, जब वह अपने पुरुष समकक्ष की तरह किसी भी सपने को देखने और पूरा करने के लिए समान अवसर, संसाधन और सहयोग प्राप्त करे और किसी लिंग-विशिष्ट बाधा का सामना न करे।

आपको बता दें कि महिला जननांग विकृति प्रथा कुछ समुदायों में धार्मिक परंपरा के रूप में प्रचलित है, लेकिन इसे महिलाओं के शारीरिक और मानसिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है। भारत में यह प्रथा डॉक्टरों और मानवाधिकार संगठनों द्वारा बार-बार सवालों के घेरे में आई है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस मुद्दे पर जल्द सुनवाई शुरू करने वाली है।

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