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Saturday, September 26, 2026
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PM के साथ प्रियंका के चाय पीने से बढ़ी सियासी हलचल, क्‍या राहुल को आएगा रास? कांग्रेस में उभरते दो पावर सेंटर

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नई दिल्‍ली । संसद सत्र (Parliament session) के समापन के बाद होने वाली पारंपरिक ‘चाय पे चर्चा’ (Discussion over tea) इस बार सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं रही, बल्कि इसने कांग्रेस (Congress) की आंतरिक राजनीति में उभरते नए समीकरणों की झलक भी दे दी। लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री (Prime Minister) का अग्रिम पंक्ति में बैठना सामान्य बात है, लेकिन इस बार पहली बार सांसद बनीं प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka Gandhi Vadra) का उसी पंक्ति में बैठकर चाय पीना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। खास बात यह रही कि संसदीय दल में किसी औपचारिक पद पर न होने के बावजूद प्रियंका को प्रमुख स्थान मिला, जबकि एनसीपी की वरिष्ठ नेता सुप्रिया सुले उनसे पीछे बैठी नजर आईं। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान प्रियंका गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच उनके संसदीय क्षेत्र वायनाड को लेकर शालीन बातचीत भी हुई।

जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी अक्सर ऐसी अनौपचारिक बैठकों से दूरी बनाए रखते हैं, वहीं प्रियंका गांधी की मौजूदगी उनकी राजनीतिक समझ और सार्वजनिक छवि की अहमियत को दर्शाती है। इस दौरान उनके चेहरे पर सहज मुस्कान और आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। इससे ठीक एक दिन पहले प्रियंका ने लोकसभा में हल्के-फुल्के अंदाज में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से वायनाड में एक हाईवे को लेकर मुलाकात का अनुरोध किया था। गडकरी ने सत्र समाप्त होते ही उन्हें अपने कार्यालय आने का आमंत्रण दे दिया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी की अनुपस्थिति में प्रियंका गांधी ने इस सत्र में प्रभावी ढंग से संसदीय कमान संभालती नजर आईं। वह रोज सुबह करीब 9:30 बजे संसद पहुंचीं, मीडिया में सक्रिय रहीं और यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस की आवाज दबने न पाए। हालांकि, उनकी रणनीति सिर्फ मौजूदगी तक सीमित नहीं दिखी। सूत्रों का कहना है कि प्रियंका गांधी ने पार्टी के भीतर ‘बिग टेंट’ अप्रोच अपनाने की पहल की। यानी अलग-थलग पड़े नेताओं को फिर से साथ लाना।

कांग्रेस के बागी आवाजों की वापसी?
बताया जा रहा है कि प्रियंका गांधी के प्रयास से ही मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेताओं को दोबारा प्रमुख बहसों में आगे लाया गया। पार्टी के भीतर यह महसूस किया गया कि अनुभवी वक्ताओं को दरकिनार करना कहीं न कहीं बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो रहा था। इसके बाद मनीष तिवारी ने SHANTI विधेयक समेत कई अहम मुद्दों पर सदन में कई बार अपनी बात रखी, जबकि शशि थरूर ने VB-G RAM G बिल पर बोलने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड मुद्दे पर मकर द्वार पर हुए विरोध प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया।

सोनिया गांधी की झलक?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, प्रियंका गांधी का यह समावेशी तरीका उनकी मां सोनिया गांधी की राजनीतिक शैली की याद दिलाता है। वह पार्टी के भीतर मतभेदों को सार्वजनिक टकराव बनने से पहले ही संभाल लेती हैं।

लोकसभा के भीतर भी प्रियंका ने सीधे टकराव से परहेज नहीं किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरने का साहस दिखाया। यह एक ऐसा विषय जिसे छूने से पार्टी के कई नेता कतराते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने संयम, दृढ़ता और हल्के हास्य के मिश्रण से सरकार को जवाब देने पर मजबूर किया।

बीजेपी मान रही नई चुनौती
बीजेपी खेमे में भी यह धारणा बनती दिख रही है कि जहां राहुल गांधी को निशाना बनाना आसान रहा है, वहीं प्रियंका गांधी एक ज्यादा जटिल और संतुलित राजनीतिक चुनौती पेश करती हैं। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वह लंबी राजनीतिक नाराजगियां नहीं पालतीं और संवाद के रास्ते खुले रखती हैं। इसी बीच, रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ उनके रिश्तों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। गौरतलब है कि बिहार अभियान के दौरान प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी की आलोचना की थी, लेकिन प्रियंका गांधी को लेकर वह हमेशा सम्मानजनक रुख अपनाते रहे।

कांग्रेस में दो पावर सेंटर?
शीतकालीन सत्र के समापन के साथ ही कांग्रेस में दो शक्ति केंद्रों का उभरना अब नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि जहां राहुल गांधी वैचारिक आंदोलनों और जन-आंदोलनों का चेहरा बने रहेंगे, वहीं रणनीति, संवाद और रोजमर्रा के राजनीतिक प्रबंधन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे प्रियंका गांधी के हाथों में जा सकती है।

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