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Tuesday, August 25, 2026
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हिडमा की मौत के बाद टॉप नक्सली कमांडरों में हडक़ंप

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मप्र-छग-महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों के नाम पत्र जारी, हथियारबंद संघर्ष सफल नहीं हो सकता

नई दिल्ली। कुख्यात माओवादी कमांडर हिडमा के मारे जाने के बाद संगठन के भीतर तेजी से हलचल बढ़ गई है। नक्सली अब सरकार के सामने सरेंडर करने और हथियार डालने राजी हो गए हैं। एमएमसी जोन (मध्य प्रदेश महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ कमेटी) के प्रवक्ता अनंत ने प्रेस रिलीज जारी कर महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सरकार से हथियार छोडक़र पुनर्वास योजना स्वीकार करने की इच्छा जताई है। वहीं इस लेटर पर सीएम साय ने कहा है कि नक्सलियों को पहले ही सरेंडर करने कहा गया है, सरकार उनके साथ न्याय करेगी।
इसके लिए 15 फरवरी 2026 तक समय देने की मांग की गई है। इसके अलावा पीएलजीए सप्ताह भी रद्द करने की बात कही गई है। केंद्रीय कमेटी का कहना है कि प्रेस रिलीज पर सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जाएगा। इसके बाद अगली प्रेस रिलीज जारी कर हथियार छोडऩे की अंतिम तारीख घोषित की जाएगी।

सशस्त्र संघर्ष को अस्थाई विराम देने का फैसला
प्रवक्ता ने बताया कि केंद्रीय कमेटी के सदस्य और पोलित ब्यूरो मेंबर कॉमरेड सोनू दादा ने बदलती परिस्थितियों का आकलन करते हुए सशस्त्र संघर्ष को अस्थाई विराम देने का फैसला लिया है, जिसका समर्थन सीसीएम सतीश दादा और सीसीएम चंद्रन्ना भी कर चुके हैं। एमएमसी जोन ने भी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है।

नहीं मनाएंगे पीएलजीए सप्ताह
अनंत ने कहा कि संगठन जनवादी केंद्रीयता की पद्धति पर चलता है, इसलिए सभी साथियों तक संदेश पहुंचाने और सामूहिक राय बनाने में समय लगेगा। उन्होंने तीनों राज्यों की सरकारों से इस अवधि तक सुरक्षाबलों के अभियान रोकने की अपील की। यहां तक कि पीएलजीए सप्ताह के दौरान भी किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध किया है। समिति ने आश्वासन दिया है कि वे इस बार पीएलजीए सप्ताह नहीं मनाएंगे और सभी गतिविधियों पर विराम देंगे।

ऑपरेशनों पर भी रोक लगाने की मांग
प्रेस रिलीज में सरकार से मुखबिर गतिविधियों और इनपुट-आधारित ऑपरेशनों पर भी रोक लगाने की मांग की गई है। साथ ही, सरकार से रेडियो पर उनके संदेश को प्रसारित करने का अनुरोध किया है ताकि दूर-दराज क्षेत्रों में मौजूद साथियों तक सूचना पहुंच सके, क्योंकि यह उनके पास बाहरी दुनिया से अपडेट रहने का एकमात्र विश्वसनीय माध्यम है। एमएमसी जोन ने यह भी इच्छा जताई है कि इस बीच उन्हें कुछ जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और यूट्यूबर पत्रकारों से मिलने का अवसर दिया जाए, ताकि हथियार त्यागने की निश्चित तारीख तय कर जल्द घोषणा की जा सके। समिति ने मध्यस्थों से भी सरकार और संगठन के बीच संवाद बढ़ाने की अपील की है।

सरकार से ‘पहला कदम’ उठाने की अपील
पत्र में एक अहम बिंदु यह है कि केंद्रीय कमेटी के संदेश में मार्च 2026 तक जनयुद्ध को रोकने की बात कही गई है। यह माओवादियों का अब तक का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव माना जा रहा है। कई कमांडरों ने इसे जीवन बचाने और भविष्य सुरक्षित करने का मौक़ा समझा है। संगठन ने अपने सदस्यों को आगे के आदेश तक संघर्ष बंद रखने को कहा है। यह संकेत है कि आने वाले महीनों में बड़े स्तर पर आत्मसमर्पण देखने को मिल सकता है। नक्सली प्रवक्ता ने सरकारों से अपील की है कि वे इस पत्र को गंभीरता से पढ़ें और सकारात्मक कदम उठाएं। संगठन चाहता है कि सरकार उनकी बात सुने और आत्मसमर्पण के इच्छुक कमांडरों को सुरक्षित रास्ता दे। शिविरों में बेहतर सुरक्षा, कानूनी प्रक्रिया में मदद और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग की गई है। पत्र में यह भी कहा गया कि यदि सरकार आगे आएगी तो नक्सली भी हथियार छोडऩे की तारीख घोषित करेंगे। इस कार्रवाई को हिडमा की मौत के बाद बनी नई जमीनी हकीकत का नतीजा माना जा रहा है।

नक्सल कमांडरों में टकराव और डर के हालात
पत्र में यह भी स्वीकार किया गया है कि संगठन के भीतर कई गुटों में टकराव बढ़ गया है। हिडमा की मौत ने यह डर और बढ़ा दिया कि अगला टारगेट कौन होगा। साथ ही कई कमांडर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लगातार दबाव, सुरक्षाबलों की घेराबंदी और कम होती ताकत से जनयुद्ध आगे नहीं बढ़ पाएगा। इसी डर और असुरक्षा के कारण कमांडरों ने संघर्ष रोकने और सुविधा मिलने पर आत्मसमर्पण की इच्छा जताई है। जंगलों में माहौल अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

जंगलों में तैनात दस्तों का मनोबल गिरा
पीएलजीए और एमएमसी जोन से जुड़े कई दस्तों के मनोबल में तेजी से गिरावट आई है। पत्र में यह स्वीकार किया गया है कि उनके पास सूचनाएं पहुंचाने का माध्यम सिर्फ चुनिंदा लोग हैं, जिससे वे दुनिया से कटते जा रहे हैं। हिडमा की मौत और अंदरूनी कमजोरियों ने उन्हें यह यकीन दिलाया है कि अब लड़ाई टिक नहीं पाएगी। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार उन्हें सुरक्षित रास्ता दे ताकि वे संगठन छोडक़र सामान्य जीवन जी सकें। यह संकेत बड़ा है कि जंगल में लडऩे वाली पीढ़ी बदलाव चाहती है।

खनन, विकास और विस्थापन के मुद्दों पर नरमी
पत्र में एक दिलचस्प बात यह है कि संगठन अब खनन कंपनियों, विस्थापन और सरकारी विकास योजनाओं पर पहले जैसी कठोर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार चाहती है तो केंद्र से बातचीत कर समस्याओं का समाधान निकाले। यह बदलाव बताता है कि नक्सल एजेंडा अब कमजोर हो चुका है। हिडमा के बाद नेतृत्व में ठोस दिशा नहीं है, इसलिए कई कमांडर चाहते हैं कि सरकार उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश करे। इसी कड़ी में आत्मसमर्पण की राह तलाशना उनके लिए आसान विकल्प बन गया है।

तीनों राज्यों के लिए बड़ा सुरक्षा बदलाव
महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों में यह पत्र बड़ी हलचल पैदा कर रहा है। सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सलवाद के कमजोर होते प्रभाव का बड़ा संकेत मान रही हैं। हिडमा की मौत ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है। अब कई कमांडर अंडरग्राउंड होने के बजाय सामने आने को तैयार हैं। यदि सरकार इस मौके को पकड़े, तो आने वाले महीनों में नक्सल मोर्चे पर बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

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