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रामनगर के कोसी ‘लट्ठा’ को 100 साल पूरे, 1926 से आज तक खड़ी है ये ब्रिटिश कालीन सुरक्षा दीवार

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रामनगर (नैनीताल): उत्तराखंड के रामनगर में स्थित कोसी तटबंध ने अपने निर्माण के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं. वर्ष 1926 में ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित यह विशाल तटबंध आज भी कोसी नदी की बाढ़ से रामनगर और आसपास के क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान कर रहा है. एक सदी का यह सफर केवल ईंट-पत्थर की कहानी नहीं, बल्कि उस दूरदर्शी सोच का प्रतीक है, जिसने रामनगर की बसावट, खेती, सिंचाई और सामाजिक जीवन को नई दिशा दी.

माना जाता है कि रामनगर की स्थापना कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रैमजे द्वारा की गई थी. पानी, घने जंगल और ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता के कारण यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था. रामनगर को कुमाऊं और गढ़वाल का प्रवेश द्वार माना जाता है. यही नहीं, यह विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट नेशनल पार्क का मुख्य प्रवेश बिंदु भी है, जो दुनिया में बाघों की सर्वाधिक घनत्व वाली आबादी में से एक के लिए जाना जाता है.

 

बाढ़ की त्रासदी से जन्मी योजना: 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में कोसी नदी रामनगर क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. जानकारों के अनुसार, वर्ष 1910 और 1913 में यहां भीषण बारिश हुई, जिससे कोसी नदी उफान पर आ गई. हजारों एकड़ कृषि भूमि बह गई. गांव-बस्तियां उजड़ गईं और भारी तबाही मची. उस समय की इन विनाशकारी बाढ़ों ने ब्रिटिश सरकार को एक स्थायी समाधान पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया.

 

इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1926 में कोसी नदी के किनारे एक मजबूत तटबंध का निर्माण किया गया, जिसे स्थानीय लोग ‘लट्ठा’ या ‘बंदा’ के नाम से जानते हैं. यह तटबंध पत्थर, चूना और सुर्खी से तैयार किया गया था, जिसकी बुनियाद इतनी मजबूत रखी गई कि यह एक सदी बाद भी अपनी जगह मजबूती से खड़ा है.

 

क्या है कोसी ‘लट्ठा’: कोसी ‘लट्ठा’, एक विशाल सुरक्षा दीवार है, जिसका उद्देश्य कोसी नदी की बाढ़ को नियंत्रित करना और रामनगर शहर, खेत-खलिहानों और बस्तियों को सुरक्षित रखना था. दरअसल, बरसात के मौसम में कोसी नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है और उसके साथ भारी मलबा और तेज बहाव आता है. लट्ठा इस उफनते पानी को नियंत्रित कर शहर की ओर बढ़ने से रोकता है.

 

स्थानीय जानकार विनोद पपने बताते हैं कि जब भी बाढ़ आती थी, लोग इस लट्ठे पर चढ़कर कोसी नदी का विकराल रूप देखने आते थे. हजारों की संख्या में रामनगर शहर और आसपास के लोग यहां इकट्ठा होते थे. कोसी के पानी की गड़गड़ाहट सुनकर लोग समझ जाते थे कि नदी उफान पर है. यह लट्ठा उस समय न सिर्फ सुरक्षा का साधन था, बल्कि लोगों के लिए एक तरह का देखने-समझने का केंद्र भी बन गया था.

 

कोसी ‘लट्ठा’ को उसकी असाधारण मजबूती के कारण ‘चाइना वॉल’ के नाम से भी जाना जाता है. लगभग पौने एक किलोमीटर लंबा यह तटबंध उस समय की इंजीनियरिंग क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है. इसकी दीवारें बड़े-बड़े पत्थरों से बनाई गईं, जिन्हें चूना और सुर्खी से जोड़ा गया. यही वजह है कि 100 साल बीत जाने के बाद भी यह संरचना आज तक खड़ी है. कोसी ‘लट्ठा’ के साथ-साथ तीन महत्वपूर्ण नहरों का निर्माण भी किया गया.
– विनोद पपने, स्थानीय जानकार –

विनोद पपने कहते हैं कि, रामनगर की बेलगढ़ नहर, रामनगर नहर और चिलकिया नहर आज भी संचालित हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई का अहम साधन बनी हुई हैं. इससे साफ है कि यह परियोजना केवल बाढ़ नियंत्रण तक सीमित नहीं थी, बल्कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने की भी एक दूरदर्शी योजना थी.

 

कोसी ‘लट्ठा’ केवल एक तटबंध नहीं, बल्कि रामनगर की ऐतिहासिक धरोहर है. इसे औपचारिक रूप से हेरिटेज घोषित किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसके इतिहास और महत्व को जान सके. रामनगर एक ऐतिहासिक शहर रहा है और यहां कई हेरिटेज इमारतें मौजूद हैं. अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कोसी लट्ठा भी उसी विरासत का हिस्सा है.
– संजय छिम्वाल, स्थानीय जानकार –

संजय बताते हैं कि, उस समय रामनगर की बसावट इसी तटबंध के आसपास विकसित हुई. कुमाऊं के कमिश्नर रहे सर हेनरी रैमजे के नाम पर ही रामनगर को कभी-कभी ‘रैमजे सिटी’ भी कहा जाता था, जो बाद में रामनगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

बाढ़ से सुरक्षा की दृष्टि से यह दीवार आज भी बेहद महत्वपूर्ण है. कोई भी मानव-निर्मित संरचना अगर 100 वर्ष पूरे कर लेती है तो वह हेरिटेज की श्रेणी में आती है. कोसी ‘लट्ठा’ रामनगर के लिए एक मिसाल है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते भूमि कटाव के कारण इसके कुछ हिस्से कमजोर हुए हैं.
– संजय छिम्वाल, स्थानीय जानकार –

आज भी रामनगर की जीवनरेखा: जानकार नरेंद्र शर्मा का कहना है कि रामनगर शहर की स्थापना हेनरी रैमजे द्वारा की गई थी और यह कुमाऊं-गढ़वाल का प्रवेश द्वार रहा है. कोसी ‘लट्ठा’ वर्ष 1926 में बनाया गया और आज इसके 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं. एक समय इस लट्ठे के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई का व्यापक उपयोग किया जाता था.

गुणवत्ता और मजबूत निर्माण के कारण यह लट्ठा आज भी खड़ा है और मौजूदा परिस्थितियों में भी रामनगर को बाढ़ से बचाने में जीवनरेखा की तरह काम कर रहा है. यह साफ दर्शाता है कि इसके निर्माण के पीछे कितनी बड़ी और दूरदर्शी सोच रही होगी.
– नरेंद्र शर्मा, स्थानीय जानकार –

वहीं इस ऐतिहासिक सुरक्षा दीवार की सुरक्षा को लेकर किए गए सवाल पर सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता राजीव खनुलिया कहते हैं कि, कोसी लट्ठे का रखरखाव सिंचाई विभाग द्वारा लगातार किया जाता है. जहां कहीं भी क्षति होती है, वहां मरम्मत और दुरुस्ती का कार्य कराया जाता है. उन्होंने मांग की है कि इस धरोहर को हेरिटेज घोषित करना चाहिए, क्योंकि इस तरह के स्ट्रक्चर काफी दुर्लभ हो गए हैं, जो आज के समय में मिलते नहीं हैं. विभाग की कोशिश है कि इस ऐतिहासिक तटबंध को सुरक्षित रखा जाए, ताकि यह आगे भी रामनगर को बाढ़ से बचाता रहे.

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