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Wednesday, August 5, 2026
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ईरान-इजराइल संघर्ष से भारतीय किसान बेहाल, 1 लाख करोड़ रुपए के कृषि माल पर खतरा

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हैदराबाद: अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने जहां भारत में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति पर संकट ला दिया है. वहीं, कारोबार पर भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. इंपोर्ट-एक्सपोर्ट दोनों पर बुरा असर देखने को मिल रहा है. बात एक्सपोर्ट की करें तो भारत अपने कृषि उत्पाद सबसे ज्यादा मिडिल ईस्ट में भेजता है. 2025 में करीब 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का एक्सपोर्ट हुआ था.लेकिन, मिडिल ईस्ट संकट के चलते यह कारोबार ठप हो गया है. लाखों टन माल रास्ते में फंसा पड़ा है. क्योंकि, मिडिल ईस्ट के देशों को जाने वाले जल, थल और वायु मार्ग बंद पड़े हैं. इसके अलावा बीमा और शिपिंग लागत भी बढ़ गई है. इससे जहां निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं किसानों पर भी बड़ा असर देखने को मिल रहा है. आईए, ETV Bharat की पहली कड़ी में जानते हैं कैसे और कितने कृषि उत्पादों के एक्सपोर्ट पर युद्ध का असर पड़ रहा है.

ईरान-इजराइल युद्ध का भारत के व्यापार पर असर: ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध के कारण पश्चिम एशिया को लगभग 11.8 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रुपए) का कृषि-खाद्य निर्यात (चावल, फल, मसाले) खतरे में हैं. बंदरगाहों पर 3,000 से अधिक कंटेनर फंसे हुए हैं.

4 लाख टन बासमती चावल रास्ते में फंसा: ईरान-इजराइल/अमेरिका तनाव ने भारत से बासमती चावल का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है. लगभग 4 लाख टन चावल पोर्ट्स या रास्ते में फंसा हुआ है. क्योंकि शिपिंग रूट बाधित हो गए हैं. युद्ध के कारण शिपिंग लागत दोगुनी हो गई है, जिससे निर्यातकों को नुकसान हो रहा है. दरअसल, ईरान, भारत के बासमती चावल का प्रमुख आयातक (25% से अधिक हिस्सा) है.लेकिन, युद्ध के कारण ईरान को होने वाली शिपमेंट ठप हो गई है. भारत वैश्विक बाजार में बासमती चावल का अग्रणी निर्यातक है. वर्ष 2024-25 के दौरान देश ने 50312.01 करोड़ रुपए (5944.42 मिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य का 60 लाख 65 हजार टन से अधिक बासमती चावल विश्व को निर्यात किया. CRISIL रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया के देशों का भारत के बासमती चावल निर्यात में लगभग 70-72% हिस्सा है, जो वर्ष 2024-25 में लगभग 60 लाख टन था.

कंटेनर का भाड़ा हुआ दोगुना, मुनाफा घटा: बासमती चावल और अन्य कृषि उत्पादों के ईरान समेत मिडिल ईस्ट के देशों से जो ऑर्डर 28 फरवरी 2026 के पहले मिले थे, उन्हें शिप कर दिया गया था. लेकिन, युद्ध-जोखिम बीमा और शिपिंग कंटेनरों की कमी के कारण अब भाड़ा दोगुना हो गया है, जिससे प्रति कंटेनर अतिरिक्त 2,000 डॉलर यानी 1.8 लाख रुपए का बोझ पड़ रहा है. जबकि, निर्यातकों को अपनी मार्जिन मनी से देना पड़ रहा है.

कंटेनर का भाड़ा हुआ दोगुना, मुनाफा घटा: बासमती चावल और अन्य कृषि उत्पादों के ईरान समेत मिडिल ईस्ट के देशों से जो ऑर्डर 28 फरवरी 2026 के पहले मिले थे, उन्हें शिप कर दिया गया था. लेकिन, युद्ध-जोखिम बीमा और शिपिंग कंटेनरों की कमी के कारण अब भाड़ा दोगुना हो गया है, जिससे प्रति कंटेनर अतिरिक्त 2,000 डॉलर यानी 1.8 लाख रुपए का बोझ पड़ रहा है. जबकि, निर्यातकों को अपनी मार्जिन मनी से देना पड़ रहा है.किसानों को नुकसान: शिपमेंट रुकने के कारण बासमती चावल समेत अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है. चावल में करीब 600-800 रुपए प्रति कुंतल की गिरावट आ गई है, जिससे किसानों और निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. निर्यात रुकने से महाराष्ट्र, कर्नाटक और अन्य राज्यों में फलों/सब्जियों की आवक बढ़ गई है और घरेलू दाम गिर गए हैं. इससे फल-सब्जी किसानों को भी नुकसान हो रहा है. इसके अलावा निर्यातकों को भुगतान में देरी का भी सामना करना पड़ रहा है.

खादी देशों को मांस का एक्सपोर्ट रुका: ईरान-इजराइल तनाव के कारण भारत का पश्चिम एशिया को होने वाला मांस और समुद्री भोजन का 16730 करोड़ रुपए (लगभग 1.81 बिलियन डॉलर) का निर्यात प्रभावित हो रहा है. ग्लोबल ट्रेड एंड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया को 16730 करोड़ रुपए (लगभग 1.81 बिलियन डॉलर) मूल्य की मछली, मांस और प्रोसेस्ड उत्पादों का निर्यात किया.निर्यात किए गए प्रमुख उत्पादों में ताजा या ठंडा गोमांस, जमा हुआ गोमांस, भेड़ और बकरी का मांस, झींगा जैसे क्रस्टेशियन शामिल हैं. पश्चिम एशिया को ताजा या ठंडा गोमांस का निर्यात 2025 में 1,158.39 करोड़ रुपए (139 मिलियन डॉलर) तक पहुंच गया, जो इस उत्पाद के भारत के कुल निर्यात का 97.4 प्रतिशत है. वहीं, इस क्षेत्र को जमे हुए गोमांस का निर्यात 10,500 करोड़ (1.27 अरब डॉलर) रहा, जो भारत के वैश्विक निर्यात का 28.9 प्रतिशत है. भेड़ और बकरी के मांस का निर्यात 790 करोड़ (95.2 मिलियन डॉलर) तक पहुंच गया, जिसमें भारत के कुल निर्यात का 98.9 प्रतिशत पश्चिम एशिया को गया. खाड़ी बाजारों में किसी भी प्रकार की बाधा से भारत के भैंस के मांस और पशुधन निर्यातकों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है. विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में, जहां अधिकांश प्रोसेस्ड इकाइयां हैं. यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो व्यापार के रुकने की आशंका है.

भारत किन देशों को करता है मांस का निर्यात: भारत मध्य पूर्व के देशों को गोमांस और मुर्गी के मांस का प्रमुख रूप से एक्सपोर्ट करता है. GTRI की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के निर्यात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया को जाता है. इनमें भेड़ और बकरी का मांस (98.9 प्रतिशत), ताजा या ठंडा गोमांस (97.4 प्रतिशत) शामिल है. पशु उत्पादों के निर्यात में भैंस का मांस, भेड़/बकरी का मांस, मुर्गी उत्पाद, पशु आंतें, दूध और दूध उत्पाद, शहद आदि शामिल हैं.

मुंबई पोर्ट पर 1200 करोड़ रुपए की फल-सब्जी फंसी: ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण पश्चिम एशिया को होने वाला भारत का फल-सब्जी निर्यात भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. मुंबई (JNPA) बंदरगाह पर 1,200 करोड़ रुपए से अधिक का माल 1,000 से ज्यादा कंटेनर में फंसा हुआ है. इन कंटेनर में केला, अंगूर, अनार, प्याज लोड है. जेबेल अली पोर्ट (दुबई) पर जहाजों की आवाजाही रुकी है और माल भेजने में 20-25 दिन ज्यादा लग रहे हैं. यही नहीं, “वॉर रिस्क सरचार्ज” जो 2000-4000 डॉलर तक का है, से लागत बढ़ गई है. शिपमेंट रुकने से नासिक के अंगूर और महाराष्ट्र से भेजे गए केले, प्याज और अन्य ताजी सब्जियां बंदरगाहों पर सड़ रही हैं.

फल-सब्जियों का कितना होता है निर्यात: 2024-25 के दौरान, भारत ने 15,100 करोड़ रुपए (1818.56 मिलियन अमेरिकी डॉलर) मूल्य के ताजे फल और सब्जियों का निर्यात किया, जिसमें ताजे फल और सब्जियां शामिल थीं. ताजे फल और सब्जियां प्रमुख रूप से बांग्लादेश, यूएई, इराक, नीदरलैंड, नेपाल, मलेशिया, यूके, श्रीलंका, ओमान और उज्बेकिस्तान को निर्यात किए गए.

2360 करोड़ रुपए का डेयरी प्रोडक्ट का एक्सपोर्ट प्रभावित: ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण भारत का लगभग 281.1 मिलियन डॉलर यानी 2360 करोड़ रुपए का (28.9% कुल डेयरी निर्यात) डेयरी और प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट प्रभावित हुआ है. समुद्री मार्ग बाधित होने और बीमा/शिपिंग लागत बढ़ने से खाड़ी देशों में माल की आपूर्ति रुक गई है, जिससे डेयरी उत्पादों के निर्यात पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है.

अंडा हुआ सस्ता: मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के चलते खाड़ी देशों से निर्यात रुकने के कारण भारत में अंडे की कीमतों में गिरावट आई है. सुरक्षा चिंताओं और परिवहन मार्गों में व्यवधान के चलते संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर और बहरीन जैसे देशों के साथ व्यापार ठप हो गया है. परिणामस्वरूप, अंडों की अधिकता के कारण घरेलू अंडों की कीमतों में अचानक गिरावट आई है, जिससे उपभोक्ताओं को राहत मिली है.कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में अंडे की कीमतें गिरी हैं. यहां एक अंडे की कीमत 7 रुपए से गिरकर 4.60 रुपए तक पहुंच गई है. इससे उन मुर्गी पालकों के लिए चुनौतियां खड़ी हो गई हैं जो निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर हैं.

तरबूज की कीमतों में गिरावट: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण, मध्य पूर्वी बाजारों में निर्यात धीमा होने से भारत में तरबूज की कीमतों में लगातार गिरावट आई है. कुछ क्षेत्रों में कीमतें गिरकर 7 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो गई हैं.
 

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