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नई दिल्ली । कॉलेज और यूनिवर्सिटी (Colleges and Universities) में भेदभाव खत्म करने के लिए लाए गए यूजीसी (UGC) के नए नियमों को केंद्र सरकार (Central government) वापस ले सकती है। नए नियमों पर व्यापक विरोध को देखते हुए सरकार बीच का रास्ता तलाशने वाले कई कदमों पर विचार कर रही है। उच्चस्तरीय सूत्रों ने कहा कि नए नियमों को लेकर गलत तरीके से राय बन रही है। इसे खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
विवाद की मुख्य वजह क्या है?
सूत्रों ने कहा, वर्ष 2012 के प्रावधानों को आधार बनाकर ही नए नियमों में कुछ रद्दोबदल किया जा सकता है। जिसके तहत भेदभाव को लेकर शिकायतों पर भी ध्यान दिया जाए और किसी भी वर्ग को अपने साथ अन्याय की आशंका न हो। सूत्रों के अनुसार दरअसल, नए नियमों को गलत तरीके से सामने लाया जा रहा है। जबकि सरकार चाहती है कि किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव न हो। नए नियमों को जहां सवर्णों के खिलाफ बताया जा रहा है वहीं एससी, एसटी वर्ग को भी यह आशंका है कि पिछड़ों को शामिल करके कहीं उनके साथ भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों का असर कम तो नहीं किया जा रहा है। सूत्रों ने कहा कि सभी फीडबैक को ध्यान में रखकर नए नियमों में संशोधन किया जा सकता है या इसे वापस लिया जा सकता है। यूजीसी ने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों एवं अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए वर्ष 2012 के पुराने नियमों की जगह 15 जनवरी 2026 से पूरे देश में नए नियम लागू किए।
बीएचयू छात्रनेता ने नए नियमों को कोर्ट में दी चुनौती
वाराणसी। बीएचयू के छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने यूजीसी के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मृत्युंजय ने अधिवक्ता नीरज सिंह के जरिए संविधान के अनुच्छेद-32 के अंतर्गत याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि विनियम 3(ग) ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करता है। याची ने न्यायालय से मांग की है कि यूजीसी विनियम 3(ग) को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जाए या उक्त प्रावधान में संशोधन का निर्देश दिया जाए, ताकि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध उसकी जाति की परवाह किए बिना जाति-आधारित भेदभाव को शामिल किया जा सके।
