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Thursday, October 15, 2026
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यूरोपीय संघ और अमेरिका के बाद अब खाड़ी देश भी भारत के साथ व्यापार समझौता करने को तैयार

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नई दिल्ली। यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों में तेजी दिखाने के बाद अब खाड़ी देश भी भारत के साथ हाथ मिलाने को बेकरार दिख रहे हैं। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत को दिखाता है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब भारत को बाजार भर नहीं, बल्कि साझेदार शक्ति के रूप में देख रही हैं। बता दें कि भारत और खाड़ी क्षेत्र के छह देशों के समूह खाड़ी सहयोग परिषद के बीच मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में दोनों पक्ष वार्ता की रूपरेखा पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। यह रूपरेखा आने वाली बातचीत का दायरा, तरीका और प्राथमिकताएं तय करेगी। इस तरह करीब दो दशक से अटकी प्रक्रिया अब फिर गति पकड़ती दिख रही है। खाड़ी सहयोग परिषद में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं। भारत पहले ही संयुक्त अरब अमीरात के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है और ओमान के साथ व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं। इसके बाद अब पूरे समूह के साथ व्यापक समझौता भारत की व्यापार नीति का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।
भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार का आधार अभी तक ऊर्जा रहा है। भारत अपने कच्चे तेल और गैस का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से मंगाता रहा है। सऊदी अरब और कतर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के प्रमुख स्तंभ हैं। दूसरी ओर भारत इन देशों को मोती, कीमती और अर्ध कीमती पत्थर, धातु, कृत्रिम आभूषण, बिजली उपकरण, लोहा, इस्पात और रसायन भेजता है। आंकड़े बताते हैं कि दोनों पक्षों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्ष में भारत का निर्यात करीब 57 अरब डॉलर के आसपास रहा, जबकि आयात 121 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया। कुल द्विपक्षीय व्यापार 178 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। यह स्तर अपने आप में इस संबंध की गहराई बताता है।
खाड़ी देश भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए भी बड़ा केंद्र हैं। करीब तीन करोड़ से अधिक भारतीय जो विदेश में रहते हैं, उनमें से बड़ी संख्या इसी क्षेत्र में काम करती है। वह हर वर्ष भारी धनराशि भारत भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण सहारा है। पहले भी भारत और समूह के बीच दो दौर की वार्ता हो चुकी थी, पर 2008 के बाद प्रक्रिया रुक गई। शुल्क में कटौती, निवेश सुरक्षा और समूह की आंतरिक प्राथमिकताओं पर मतभेद के कारण बातचीत ठंडी पड़ गई थी। अब निवेश संधि और व्यापार समझौते को अलग अलग रास्ते पर रखकर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की गई है।
भारत ने हाल में यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में प्रगति दिखाई है। इसतरह के माहौल में खाड़ी क्षेत्र के साथ नई पहल यह संकेत देती है कि नई दिल्ली अब व्यापार समझौतों को केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामरिक साधन के रूप में भी देख रही है।
खाड़ी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की ओर बढ़ता कदम केवल बदलती विश्व राजनीति का संकेत भी है। दुनिया की ताकत अब केवल हथियार से नहीं, बाजार, आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा मार्गों से तय हो रही है। जो देश अपने लिए स्थिर ऊर्जा स्रोत और खुले बाजार सुरक्षित कर लेगा, वही आने वाले दशकों में मजबूती से खड़ा रहेगा। भारत लंबे समय तक सतर्क और कभी कभी संकोची व्यापार नीति अपनाता रहा। पर अब हालात बदल रहे हैं। वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत को अपने बड़े बाजारों को खोलना ही होगा। खाड़ी क्षेत्र इसमें स्वाभाविक साथी है, क्योंकि यहां ऊर्जा है, धन है, निवेश की क्षमता है और भारत के लिए काम करने वाली विशाल जनशक्ति भी यहीं मौजूद है।
बहरहाल, पर इस उत्साह में आंख मूंद लेना भी ठीक नहीं होगा। मुक्त व्यापार समझौते का अर्थ है अपने बाजार को खोलना। यदि घरेलू उद्योग तैयार नहीं हुए तो सस्ता आयात कई क्षेत्रों पर चोट कर सकता है। इसलिए सरकार को केवल समझौते पर हस्ताक्षर करने की जल्दी नहीं, बल्कि घरेलू उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की भी उतनी ही चिंता करनी होगी। 

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