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कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने राज्यसभा में उठाया जातिगत भेदभाव का मुद्दा, बोले- सामाजिक न्याय संविधान की आत्मा 

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नई दिल्ली। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सदन में जातिगत भेदभाव का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने कहा कि दलितों, वंचितों और कमजोर वर्गों के उत्थान की बातें अक्सर की जाती हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि इन्हें जमीन पर उतारने की ठोस पहल हो। सामाजिक न्याय केवल एक नारा नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा है और इसकी रक्षा करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। 
कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने ओडिशा की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इक्कीसवीं सदी में जब हम सामाजिक विकास और एकता की बात करते हैं, तब ऐसी घटनाएं हमें आईना दिखाती हैं। उन्होंने बताया कि ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में पिछले तीन महीनों से बहिष्कार चल रहा है, क्योंकि वहां भोजन एक दलित महिला हेल्पर और कुक द्वारा तैयार किया जा रहा है। समुदाय विशेष के कुछ लोग अपने बच्चों को वह भोजन देने से इनकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल एक महिला का अपमान नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक चेतना की परीक्षा है।
उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास की बुनियाद होते हैं। यदि वहां जातिगत पूर्वाग्रह को बढ़ावा मिलेगा, तो इसका असर बच्चों के मन और भविष्य पर पड़ेगा। छोटे बच्चों के सामने इस तरह का भेदभाव उनके भीतर विभाजन और नफरत के बीज बो सकता है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 21(क) के तहत शिक्षा के अधिकार और अनुच्छेद 47 के तहत राज्य की पोषण संबंधी जिम्मेदारी की भावना के खिलाफ बताया।
खड़गे ने कहा कि इस घटना को केवल एक सामाजिक विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसे कार्यस्थलों पर व्यापक जाति-आधारित भेदभाव के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने मध्य प्रदेश में एक आदिवासी मजदूर के साथ हुई अमानवीय घटना, गुजरात में एक दलित सरकारी कर्मचारी की कथित उत्पीड़न के बाद आत्महत्या और चंडीगढ़ में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मृत्यु के बाद सामने आए संस्थागत भेदभाव के आरोपों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जातिगत पूर्वाग्रह समाज के साथ-साथ संस्थागत ढांचे में भी मौजूद है। 
संविधान का हो रहा उल्लंघन 
उन्होंने कहा कि ऐसा व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो समानता, भेदभाव निषेध और अस्पृश्यता उन्मूलन की गारंटी देते हैं। साथ ही, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे सख्त कानून भी ऐसे अपराधों को रोकने और दोषियों को दंडित करने के लिए मौजूद हैं।

ऐसे मामलों को गंभीरता से ले सरकार 
खड़गे ने सरकार से मांग की कि ऐसे मामलों को अत्यंत गंभीरता से लिया जाए। जहां भी जातिगत भेदभाव की घटनाएं सामने आएं, वहां त्वरित और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए तथा पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने आंगनवाड़ी जैसे संवेदनशील संस्थानों में जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत बताई, ताकि बच्चों के मन में बराबरी, सम्मान और सामाजिक समरसता के संस्कार विकसित हो सकें।

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News Desk

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