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झारखंड में बिहार जैसा ‘खेला’ हेमंत सोरेन की BJP नेताओं से ‘गुप्त’ मुलाकात ने मचाया सियासी तूफान!

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JMM BJP Alliance Rumours: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिली प्रचंड जीत का असर झारखंड तक दिखाई दे रहा है. राजनीति में चुप्पी अक्सर संकेतों की भाषा होती है. झारखंड की राजनीति वर्तमान समय में उस मोड़ पर खड़ी है, जहां किसी भी समय नया गठबंधन, नई दिशा या संतुलन की घोषणा हो सकती है. सूत्रों के अनुसार, झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता एवं पूर्व सीएम हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन ने भाजपा के एक दिग्गज नेता से मुलाकात की है, जिसमें साथ आने की प्राथमिक सहमति बनी है. हालांकि, इसमें कितनी सच्चाई है. यह तो आने वाले दिनों में ही क्लियर होगा. लेकिन एक बात तो साफ है कि इस मुलाकात ने झारखंड की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है.

इसके साथ ही चर्चा यह भी है कि बाबूलाल मरांडी या चम्पाई सोरेन दोनों में से किसी एक को डिप्टी सीएम बनायाा जा सकता है. झारखंड में यह चर्चा भी उस समय चली, जब झारखंड में सत्ता संतुलन बदलने की कोई जरूरत नहीं दिखती है. इसलिए कहा यह भी जा रहा कि झारखंड में सत्ता का समीकरण भले ही सबको स्थिर दिख रहा है, लेकिन भीतरखाने में बदलाव की आहत तेज हो गई है.

अभी क्या है स्थिति?
झारखंड में वर्तमान समय में झामुमो-राजद और कांग्रेस के पास बहुमत है. वहीं, अगर इनमें से कोई भी सहयोगी दल अलग हो भी जाए तो झामुमो को कोई खास प्रभाव नहीं पडे़गा. वह अपने दम पर सरकार चला सकती है. इसके बावजूद भी आखिर ऐसी क्या जरूरत पड़ी की हेमंत भाजपा के बड़े नेताओं से मिल रहे हैं. राजनीतिक एक्सपर्ट की मानें तो इसकी कई वजहें हैं, जिसकी वजह से उन्हें हाथ मिलाने की जरूरत पड़ रही है.

एनडीए में क्यों शामिल हो सकती है झामुमो
झामुमो ने झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान कई वादे किए थे. जिसको पूरा करने के लिए आर्थिक फंड की काफी ज्यादा जरूरत है. यानी हेमंत की पार्टी आर्थिक संकटों से जूझ रही है. झामुमो ने विधानसभा में किए वादे को पूरा करने के लिए यह कदम उठा सकती है. क्योंकि मइयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को 2,500 रुपये प्रतिमाह देने और धान का समर्थन मूल्य बढ़ाकर 3,200 रुपये प्रति क्विंटल देने में सरकार को दिक्कत आ रही है.

केंद्र में महागठबंधन की सरकार नहीं है कि बजट मिल जाएगा. ऐसे में अगर बजट लाकर सरकार चलाना चाह रहे हैं तो उन्हें केंद्र सरकार से हाथ मिलाना ही पड़ेगा. वहीं, इससे भाजपा को भी झारखंड में राजनीतिक संतुलन बनाने में आसानी होगी. क्योंकि काफी समय से भाजपा आदिवासी वोटरों से दूर हो गई है. BJP के लिए यही सही मौका रहने वाला है. यानी झारखंड में किसी भी समय परिवर्तन की आहट सुनाई दे सकती है.

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