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भारत की सांस्कृतिक विरासत की वापसी अमेरिका लौटाएगा चोरी की गई तीन मूर्तियां

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नई दिल्ली। भारत(India) की सांस्कृतिक विरासत (cultural heritage)से जुड़ा एक अहम और ऐतिहासिक फैसला (historic decision)अमेरिका में लिया गया है। वाशिंगटन डीसी स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ((Smithsonian National Museum)ऑफ एशियन आर्ट(Asian art) ने यह स्वीकार किया है कि उसके संग्रह में मौजूद तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियां दशकों (ancient bronze sculptures)पहले भारत के दक्षिणी हिस्से के मंदिरों से अवैध रूप से चोरी की गई थीं। म्यूजियम ने अब इन मूर्तियों को भारत सरकार को लौटाने का निर्णय लिया है। यह फैसला वर्षों चली जांच और पुख्ता ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर लिया गया है।
इन मूर्तियों की पहचान और उनके मूल स्थान की पुष्टि फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो अभिलेखागार के जरिए की गई। शोधकर्ताओं को इस संस्थान के पास मौजूद वे दुर्लभ तस्वीरें मिलीं जो उन्नीस सौ छप्पन से उन्नीस सौ उनसठ के बीच तमिलनाडु के विभिन्न मंदिरों में खींची गई थीं। इन तस्वीरों में वही मूर्तियां अपने मूल स्थान पर स्थापित दिखाई दीं जिससे यह साफ हो गया कि इन्हें बाद में अवैध रूप से वहां से हटाया गया था।

वापस की जाने वाली तीनों मूर्तियां दक्षिण भारतीय कांस्य शिल्प कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें पहली मूर्ति चोल काल की शिव नटराज की है जो लगभग नौ सौ नब्बे ईस्वी की मानी जाती है। यह मूर्ति तमिलनाडु के तंजानूर जिले के तिरुथुराईपुंडी स्थित श्री भव औषधीश्वर मंदिर से चोरी की गई थी। दूसरी मूर्ति सोमस्कंद की है जो बारहवीं शताब्दी के चोल काल से संबंधित है। यह मन्नारगुड़ी के अलत्तूर क्षेत्र में स्थित विश्वनाथ मंदिर से गायब हुई थी। तीसरी मूर्ति संत सुंदरर और परवई की है जो सोलहवीं शताब्दी के विजयनगर काल की है और कल्लाकुरिची के वीरसोलापुरम स्थित शिव मंदिर से चोरी की गई थी।

म्यूजियम की आंतरिक जांच में यह भी सामने आया कि शिव नटराज की मूर्ति को वर्ष दो हजार दो में न्यूयॉर्क की एक गैलरी से खरीदा गया था। उस गैलरी ने बिक्री के समय फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए थे। वहीं बाकी दो मूर्तियां उन्नीस सौ सत्तासी में म्यूजियम को उपहार के रूप में दी गई थीं। उस समय इनके स्रोत की गहराई से जांच नहीं की गई थी।

भारत सरकार और स्मिथसोनियन म्यूजियम के बीच एक विशेष समझौता भी हुआ है। इसके तहत शिव नटराज की मूर्ति को औपचारिक रूप से भारत को सौंपे जाने के बाद भारत सरकार इसे दीर्घकालिक ऋण पर म्यूजियम को वापस देगी। इससे म्यूजियम इस मूर्ति को अपनी प्रदर्शनी द आर्ट ऑफ नोइंग में प्रदर्शित कर सकेगा। अब इस मूर्ति के साथ उसकी चोरी और भारत वापसी की पूरी सच्ची कहानी भी दर्शकों को बताई जाएगी।
म्यूजियम के निदेशक चेस रॉबिन्सन ने कहा कि यह निर्णय सांस्कृतिक विरासत के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता को दर्शाता है। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और भारत सरकार के सहयोग के लिए आभार जताया। यह कदम न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।

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